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Aryan The Martial Yoddha
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पूर्व दिशा. क्षितिज के उस पार से उगते सूर्य की पहली किरणें जब अरण्यपुर की हरी- भरी घाटियों पर पडीं, तो ओस की छोटी- छोटी बूंदें ऐसे चमक उठीं जैसे धरती ने असंख्य मोती बिखेर दिए हों. ठंडी हवा पहाडों से उतरकर खेतों के बीच से गुजर रही थी. दूर नदी का स्वच्छ जल चट...
Storyline
पूर्व दिशा. क्षितिज के उस पार से उगते सूर्य की पहली किरणें जब अरण्यपुर की हरी- भरी घाटियों पर पडीं, तो ओस की छोटी- छोटी बूंदें ऐसे चमक उठीं जैसे धरती ने असंख्य मोती बिखेर दिए हों. ठंडी हवा पहाडों से उतरकर खेतों के बीच से गुजर रही थी. दूर नदी का स्वच्छ जल चट्टानों से टकराकर मधुर संगीत बना रहा था. पक्षियों की चहचहाहट पूरे वातावरण में जीवन का संदेश फैला रही थी. अरण्यपुर. यह कोई बडा नगर नहीं था. न यहाँ ऊँची- ऊँची पत्थर की दीवारें थीं. न विशाल राजमहल. न कोई प्रसिद्ध मार्शल संप्रदाय. यह केवल एक छोटा- सा गाँव था. जहाँ लोग एक- दूसरे को नाम से जानते थे और सुख- दुःख में साथ खडे रहते थे. लेकिन इस गाँव की एक विशेषता थी. यह गाँव अरण्य पर्वत और नागवन के बीच बसा था. गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि इन पहाडों के भीतर कभी महान मार्शल योद्धाओं ने साधना की थी. आज उन कथाओं को लोग सिर्फ दंतकथा समझते थे. लेकिन. हर दंतकथा की जड में कहीं न कहीं एक सच्चाई छिपी होती है. ठक. ठक. ठक. सुबह की शांति को भंग करती हथौडे की आवाज गाँव के पूर्वी छोर से आ रही थी. वहाँ मिट्टी और पत्थरों से बना एक साधारण- सा घर था. घर के पीछे बनी छोटी- सी भट्ठी में तेज आग जल रही थी. भट्ठी के सामने खडा एक मजबूत व्यक्ति लाल तपे लोहे पर लगातार हथौडा चला रहा था. उसका हर प्रहार नपा- तुला था. न एक प्रहार कम. न एक अधिक. उसका नाम था— वीरेंद्र. अरण्यपुर का लोहार. लेकिन गाँव के लोग उसे केवल लोहार नहीं मानते थे. वे कहते थे— यदि वीरेंद्र कोई औजार बना दे, तो वह वर्षों तक साथ नहीं छोडता। वीरेंद्र इन बातों पर कभी गर्व नहीं करते थे. उनके लिए काम ही पूजा था. भट्ठी के दूसरी ओर एक किशोर धौंकनी चला रहा था. उसके हाथों में छाले थे. माथे पर पसीना था. लेकिन चेहरे पर शिकायत का एक भी भाव नहीं. उसकी आँखों में केवल सीखने की इच्छा थी. वह था— आर्यन. सोलह वर्ष का एक साधारण लडका. न उसके पास कोई दिव्य शक्ति थी. न कोई महान रक्तरेखा. न कोई प्रसिद्ध गुरु. वह केवल एक लोहार का बेटा था. जो हर दिन मेहनत करता था. आग को देखो. वीरेंद्र ने बिना पीछे मुडे कहा. आर्यन ने तुरंत धौंकनी की गति बदली. कुछ ही क्षणों में आग पहले से अधिक प्रचंड हो उठी. वीरेंद्र मुस्कुराए. अच्छा। उन्होंने तपते हुए लोहे को बाहर निकाला. हथौडा उठाया. और एक के बाद एक प्रहार करने लगे. ठक! ठक! ठक! आर्यन हर प्रहार को ध्यान से देख रहा था. उसे हमेशा यह कला अद्भुत लगती थी. क बेकार लोहे का टुकडा. धीरे- धीरे आकार लेने लगता था. कुछ देर बाद वीरेंद्र ने हथौडा नीचे रखा. बताओ. तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है? आर्यन ने उस अधबने औजार को देखा. एक हल का फाल। वीरेंद्र मुस्कुराए. मुझे भी यही दिखाई देता है. लेकिन एक किसान को इसमें अपने परिवार का पेट दिखाई देगा। आर्यन कुछ पल के लिए
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