“ब्रह्मांड का सम्राट: गौरव राज” - Episode 1
“ब्रह्मांड का सम्राट: गौरव राज”EPISODE 1 : कॉलेज की साधारण सुबह और असाधारण शुरुआत
साल 2025।
झारखंड, बोकारो स्टील सिटी।
राधागांव की गलियों में सुबह की हल्की धूप उतर रही थी। चाय की दुकानों से उठती भाप, साइकिलों की घंटियाँ, और दूर स्टील प्लांट की सीटी—सब मिलकर रोज़ की तरह एक सामान्य दिन का ऐलान कर रहे थे।
इसी सामान्यता के बीच, एक घर की छत पर खड़ा था गौरव राज।
कॉलेज की यूनिफॉर्म पहने, कंधे पर बैग लटकाए, वह आसमान की तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखों में सपने थे—बड़े, बेतरतीब, और थोड़े अधूरे।
“एक दिन… सब बदलूँगा,” वह धीमे से बोला, जैसे खुद से वादा कर रहा हो।
गौरव राज, उम्र इक्कीस साल। बोकारो के एक प्राइवेट कॉलेज में बी.टेक का छात्र। पढ़ाई ठीक-ठाक, लेकिन दिमाग तेज़। दोस्तों का बड़ा सा झुंड—करीब पच्चीस। कोई क्रिकेट का दीवाना, कोई कोडिंग का, कोई सिर्फ़ मस्ती का। और गौरव? वह सबके बीच वह लड़का था जिस पर सब भरोसा करते थे।
नीचे से माँ की आवाज़ आई, “गौरव, देर हो रही है!”
“आ रहा हूँ माँ!”
वह सीढ़ियाँ उतरते हुए मुस्कराया।
राज परिवार—साधारण लेकिन आत्मसम्मान से भरा। पिता, स्टील प्लांट में काम करने वाले; माँ, घर की रीढ़; दादा, जिनकी आँखों में अनुभव की आग अभी बुझी नहीं थी; और घर के छोटे बच्चे—भविष्य की मासूम हँसी।
नाश्ते के दौरान दादा ने कहा, “बेटा, ताकत सिर्फ़ शरीर में नहीं, मन में भी होनी चाहिए।”
गौरव ने सिर हिलाया। “एक दिन… दोनों होंगी, दादू।”
कॉलेज का कैंपस हमेशा की तरह शोर से भरा था। दोस्त इकट्ठा हुए—
अमन, रोहित, शिवम, करण, अर्जुन… नामों की एक पूरी दुनिया। हँसी, मज़ाक, हल्की-फुल्की बहसें।
“ओए गौरव,” अमन बोला, “आज फिर वो प्रोफेसर लेट आएगा, शर्त लगाते हैं?”
“शर्त छोड़,” गौरव हँसा, “आज कुछ अलग होने वाला है।”
“हर दिन यही बोलता है,” करण ने आँख मारी।
लेक्चर के दौरान गौरव का मन भटक रहा था। स्क्रीन पर कोड चल रहा था, लेकिन उसके भीतर कुछ और ही चल रहा था—एक अजीब-सी बेचैनी, जैसे कोई अदृश्य दरवाज़ा उसके सामने खड़ा हो।
ब्रेक में सब दोस्त कैंटीन गए। हँसी के बीच गौरव थोड़ा अलग बैठा, फोन देख रहा था। अचानक स्क्रीन झिलमिलाई। नेटवर्क गायब। बैटरी फुल।
“ये क्या…” उसने फोन हिलाया।
तभी उसके कानों में एक हल्की-सी आवाज़ गूंजी—
पहले फुसफुसाहट, फिर स्पष्ट।
“अनुकूलता की पुष्टि की जा रही है…”
गौरव चौंककर इधर-उधर देखने लगा। “किसने बोला?”
दोस्त हँस रहे थे, किसी को कुछ सुनाई नहीं दिया।
“अनुकूलता: 100%।”
“होस्ट चयनित।”
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“ये मज़ाक है क्या?” उसने खुद से कहा।
तभी उसकी आँखों के सामने नीली रोशनी की एक पारदर्शी परत उभरी। किसी और को नहीं—सिर्फ़ उसे दिख रही थी।
[सुपर ओरिजिन सिस्टम सक्रिय]
गौरव की साँस रुक-सी गई।
होस्ट: गौरव राज
स्थान: पृथ्वी लोक
स्थिति: सामान्य मानव (अप्रकट क्षमता)
“सिस्टम?”
उसने गेम्स और नॉवेल्स पढ़े थे, लेकिन कभी सोचा नहीं था कि…
“होस्ट को प्रारंभिक सहायता प्रदान की जा रही है।”
“स्किल चयन उपलब्ध।”
स्क्रीन पर नाम उभरे—
ताबीज विद्या (बेसिक)
तलवारबाज़ी (प्रारंभिक)
शारीरिक सुदृढ़ीकरण
सूक्ष्म ऊर्जा अनुभव
गौरव का दिमाग घूम गया। “अगर ये सपना है… तो भी पूरा देख लूँ।”
“ताबीज विद्या,” उसने सोचा।
“स्वीकृत।”
एक झटका-सा लगा। जैसे किसी ने उसके दिमाग में ज्ञान की एक पतली-सी धारा डाल दी हो। चिन्ह, प्रतीक, ऊर्जा की दिशा—सब हल्का-हल्का समझ में आने लगा।
“ओए, कहाँ खो गया?” रोहित ने कंधा थपथपाया।
गौरव हड़बड़ा गया। स्क्रीन गायब।
“कुछ नहीं… बस भूख लगी है,” उसने झूठ बोला।
दिन किसी तरह खत्म हुआ। कॉलेज के बाद सब दोस्त मैदान में रुके। क्रिकेट, हँसी, शोर। गौरव खेल रहा था, लेकिन ध्यान कहीं और था।
शाम ढलते ही वह अकेला घर की तरफ़ निकला। रास्ते में एक सुनसान पार्क पड़ा। न जाने क्यों उसके कदम रुक गए।
उसी पल—
“प्रथम मिशन सक्रिय।”
“अब क्या?” गौरव बुदबुदाया।
“छोटी परीक्षा: साहस और करुणा।”
पार्क के कोने से किसी के रोने की आवाज़ आई। गौरव दौड़ा। एक बूढ़ा आदमी ज़मीन पर गिरा था, पैर में चोट।
“बाबा, ठीक हैं आप?” गौरव ने सहारा दिया।
उसने अपनी नई सीखी ताबीज विद्या से, बिना पूरी समझ के, एक छोटा-सा प्रतीक हवा में उकेरा। हल्की गर्माहट फैली। बूढ़े की पीड़ा कम हुई।
“बेटा…,” बूढ़ा कांपती आवाज़ में बोला, “तू बहुत आगे जाएगा।”
तभी स्क्रीन फिर उभरी।
“मिशन पूर्ण।”
“इनाम: बेसिक लूट बॉक्स।”
गौरव की आँखें चमक उठीं।
“खोलो,” उसने मन ही मन कहा।
[लूट बॉक्स खुल रहा है…]
रोशनी फूटी।
“शारीरिक सुदृढ़ीकरण +5%”
“राज परिवार लिंक सक्रिय (सीमित)”
“राज परिवार…?”
उसके दिल में एक अजीब-सी गर्माहट दौड़ गई। जैसे कोई वादा किया गया हो—कि वह सिर्फ़ खुद को नहीं, अपने पूरे परिवार को ऊपर उठाएगा।
घर पहुँचा तो माँ ने पूछा, “आज देर क्यों हो गई?”
गौरव मुस्कराया। “माँ… आज से सब बदलेगा।”
रात को छत पर लेटे हुए उसने आसमान देखा। तारे वैसे ही थे, लेकिन उसके लिए दुनिया बदल चुकी थी।
“होस्ट,” सिस्टम की आवाज़ गूंजी,
“यह सिर्फ़ शुरुआत है।”
“पृथ्वी लोक में 3 आंतरिक चरण शेष।”
गौरव ने मुट्ठी भींची।
कॉलेज का एक साधारण लड़का,
राज परिवार का एक सामान्य बेटा—
आज एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ा था
जहाँ दोस्त, परिवार, देश…
और एक दिन पूरी पृथ्वी
उसके साथ आगे बढ़ने वाली थी।
और पृथ्वी लोक…
अभी नहीं जानता था कि
उसका भविष्य
इसी लड़के के हाथों में लिखा जा रहा है।