अमर साधना - Episode 5
अमर साधना“आकाश में खुली काली आँख”
आकाश में खुली वह विशाल काली आँख पूरे जंगल को घूर रही थी।
उसकी लाल पुतली से निकलती ऊर्जा हवा को विकृत कर रही थी।
तारा भय से काँप उठी।
> “ये… ये कालनेत्र की आँख है?”
महागुरु अमरेश का चेहरा कठोर हो गया।
> “नहीं…
यह उसकी चेतना का अंश है।
असली कालनेत्र इससे कहीं अधिक भयानक है।”
अचानक आकाश से लाल बिजली नीचे गिरी।
धड़ाआआम!!
धरती फट गई और चारों ओर आग फैलने लगी।
विशाल पत्थर योद्धा तुरंत आरव के सामने खड़ा हो गया।
उसकी भारी आवाज़ गूँजी—
> “स्वामी की रक्षा प्राथमिक आदेश है।”
आरव अभी भी भ्रमित था।
उसके मन में युद्ध और विनाश के दृश्य घूम रहे थे।
> “ये सब… मेरे साथ क्यों हो रहा है?”
तभी उसकी हथेली का चिन्ह फिर चमक उठा।
इस बार उसके सामने नीली रोशनी से बने शब्द प्रकट हुए—
> “अमर साधना – प्रथम चरण सक्रिय।”
तारा आश्चर्य से बोली—
> “ये अक्षर हवा में कैसे तैर रहे हैं?”
लेकिन गुरु अमरेश की आँखों में चिंता थी।
क्योंकि उन्हें वे शब्द दिखाई ही नहीं दे रहे थे।
> “तारा… तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?”
> “नीली रोशनी…”
> “मुझे कुछ नहीं दिख रहा।”
आरव चौंक गया।
उसे समझ आ गया—
यह शक्ति केवल उसी से जुड़ी थी।
तभी आकाश में बनी काली आँख अचानक चमकी।
एक भारी आवाज़ गूँजी—
> “उत्तराधिकारी…
अपनी शक्ति मुझे सौंप दो।”
अचानक हजारों काले धागे आसमान से नीचे उतरने लगे।
वे सीधे आरव की ओर बढ़ रहे थे।
तारा घबरा गई।
> “सावधान!”
विशाल योद्धा ने अपनी तलवार निकाली और उन धागों को काटने लगा।
लेकिन हर कटे धागे की जगह दो नए धागे पैदा हो जाते।
महागुरु अमरेश ने अपने हाथ जोड़कर मंत्र उच्चारण शुरू किया।
उनके चारों ओर सुनहरी ऊर्जा घूमने लगी।
> “स्वर्ण कवच मंत्र!”
एक विशाल सुनहरी ढाल पूरे क्षेत्र के चारों ओर बन गई।
काले धागे ढाल से टकराकर जलने लगे।
लेकिन तभी—
चटाक!!
ढाल में दरार पड़ गई।
गुरु अमरेश पीछे लड़खड़ा गए।
उनके होंठों से खून निकल आया।
तारा घबरा उठी।
> “गुरुदेव!”
गुरु भारी साँस लेते हुए बोले—
> “कालनेत्र की शक्ति… पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है…”
आरव ने मुट्ठी भींच ली।
वह अब और भागना नहीं चाहता था।
उसने अपनी आँखें बंद कीं।
उसी क्षण उसके भीतर फिर वही सुनहरा मंदिर दिखाई दिया।
लेकिन इस बार मंदिर का पहला द्वार खुल चुका था।
अंदर नीली अग्नि का समुद्र जल रहा था।
और उस अग्नि के बीच एक प्राचीन तलवार हवा में तैर रही थी।
तलवार से वही आवाज़ गूँजी—
> “यदि शक्ति चाहिए…
तो भय त्यागना होगा।”
आरव धीरे-धीरे तलवार की ओर बढ़ा।
जैसे ही उसने तलवार को छुआ—
धड़ाआआम!!
वास्तविक दुनिया में नीली ऊर्जा का विस्फोट हुआ।
पूरा जंगल प्रकाश से भर गया।
आकाश में फैले काले धागे पलभर में जलकर राख हो गए।
काली आँख पहली बार दर्द से चीखी।
> “असंभव!!”
जब प्रकाश कम हुआ…
आरव के हाथ में अब एक दिव्य नीली तलवार थी।
उसकी धार से ऊर्जा की लहरें निकल रही थीं।
तारा स्तब्ध रह गई।
> “यह… कितनी अद्भुत शक्ति है…”
महागुरु अमरेश धीरे से बोले—
> “अमर साधना की दिव्य तलवार…
आखिरकार जाग चुकी है…”
लेकिन तभी…
दूर पहाड़ों के बीच अचानक दर्जनों लाल आँखें चमक उठीं।
एक नहीं…
दो नहीं…
बल्कि सैकड़ों।
और जंगल में एक साथ भयानक गर्जना गूँज उठी।
> “ग्रररररर!!”
तारा का चेहरा पीला पड़ गया।
> “इतने सारे दानव…?”
गुरु अमरेश ने आकाश की ओर देखा।
> “कालनेत्र ने अपनी सेना भेज दी है…”
आरव ने अपनी तलवार कसकर पकड़ ली।
उसकी आँखों में अब भय नहीं था।
केवल संकल्प।
क्रमशः…