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Chapter 1

अग्निश्रृंग: पुनर्जन्म का ड्रैगन” - Episode 1

अग्निश्रृंग: पुनर्जन्म का ड्रैगन”

: राख में सोई स्मृति

गाँव की सुबह साधारण थी। धूप वही थी, हवा वही, और लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। फिर भी उस दिन कुछ अलग था—ऐसा जिसे देखा नहीं जा सकता था, केवल महसूस किया जा सकता था। जैसे धरती के भीतर कोई पुरानी साँस जाग रही हो।

वह युवक नदी किनारे बैठा था। उसके कपड़े साधारण थे, जीवन भी साधारण। लोग उसे जानते थे, पर पहचानते नहीं थे। उसे स्वयं भी नहीं पता था कि वह किसे खोज रहा है, बस इतना जानता था कि भीतर कहीं एक खालीपन है—जो भरने की ज़िद नहीं करता, पर चुप भी नहीं रहता।

उसने पानी में पत्थर फेंका। लहरें उठीं, फिर शांत हो गईं। उसी क्षण उसके भीतर एक अजीब-सी टीस उठी, जैसे यह दृश्य वह पहले भी देख चुका हो—किसी और समय में, किसी और रूप में। उसने सिर झटक दिया। यह बस थकान होगी, उसने सोचा।

दूर आकाश में बादल बिना कारण घिर आए। हवा में हल्की गर्मी घुल गई। गाँव के कुछ पशु बेचैन हो गए। किसी ने ध्यान नहीं दिया, सिवाय उसके। उसकी साँसें अनायास तेज़ हो गईं।

उसी समय, मानव लोक से बहुत दूर, ड्रैगन लोक में एक प्राचीन शिला काँपी। उस पर सोया हुआ विशाल ड्रैगन हिला। वज्रनाग ने आँखें खोलीं। उसकी दृष्टि समय को चीरती हुई नीचे उतरी।

“स्मृति ने करवट बदली है,” उसने कहा।

यह चेतावनी थी, या स्वीकार—कोई नहीं जानता था।

छाया लोक में भी हलचल हुई। वहाँ कोई प्रकाश नहीं था, पर अंधकार सघन भी नहीं था। एक आकृति उभरी—न पूरी, न अधूरी। उसने मुस्कराने की कोशिश की।

“तो वह जन्म ले चुका है,” उसने फुसफुसाया।

“दिलचस्प।”

मानव लोक में युवक अचानक खड़ा हो गया। उसे लगा, जैसे किसी ने भीतर से पुकारा हो—नाम लेकर नहीं, भावना से। उसके कदम अपने आप चल पड़े। वह गाँव से बाहर, पुराने टीले की ओर बढ़ गया, जहाँ लोग कम जाते थे।

टीले पर राख फैली थी। वर्षों पुरानी। कभी यहाँ आग जली थी—किसी यज्ञ की, किसी संस्कार की। युवक ने अनायास घुटनों के बल बैठकर राख को छुआ।

क्षण भर को उसकी आँखों के सामने दृश्य बदल गया।

आकाश में आग थी।

धरती पर युद्ध।

और उसके सामने—ड्रैगन।

वह दृश्य तुरंत टूट गया। युवक हाँफने लगा। उसका हाथ काँप रहा था। राख अब भी ठंडी थी, पर उसकी हथेली गर्म हो चुकी थी।

“यह क्या था?” उसने स्वयं से पूछा।

उत्तर नहीं मिला।

शाम होते-होते गाँव में बातें फैलने लगीं—कि आज पक्षी असामान्य थे, कि हवा भारी थी। किसी ने कहा, यह बस मौसम है। किसी ने कहा, देवताओं का संकेत। युवक चुप रहा।

रात को वह सो नहीं पाया। आँख बंद करता, तो राख दिखती। आग नहीं—राख। जैसे सब कुछ जल चुका हो, और फिर भी कुछ बचा हो।

आधी रात को उसने सपना देखा। एक विशाल प्राणी उसके सामने खड़ा था—ड्रैगन। पर वह क्रोधित नहीं था। उसकी आँखों में करुणा थी।

“तुमने बहुत पहले एक वचन दिया था,” वह बोला—बिना शब्दों के।

“कौन-सा वचन?” युवक ने पूछा।

“भूलने का,” ड्रैगन ने उत्तर दिया।

“ताकि समय आने पर याद करना संभव हो।”

सुबह युवक की आँख खुली। उसकी हथेली पर हल्का-सा निशान उभरा था—स्पष्ट नहीं, पर मौजूद। जैसे कोई चिन्ह बनने की तैयारी में हो।

वह नहीं जानता था कि यह पुनर्जन्म की शुरुआत है।

वह नहीं जानता था कि वह कभी ड्रैगन-योद्धा था।

पर तीनों लोक जान चुके थे—

राख के नीचे

स्मृति जाग चुकी है।

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