अग्निश्रृंग: पुनर्जन्म का ड्रैगन” - Episode 2
अग्निश्रृंग: पुनर्जन्म का ड्रैगन”: अग्नि की पहली साँस
रात का अंधकार गाढ़ा था, जैसे आसमान ने धरती पर झुककर साँस रोक ली हो। युवक नींद में बेचैन था। उसकी छाती उठ-गिर रही थी, और हर श्वास के साथ भीतर कोई पुरानी आग सुलग रही थी। यह साधारण सपना नहीं था—यह स्मृति की दस्तक थी।
उसने स्वयं को ऊँचे पर्वतों के बीच खड़ा पाया। नीचे घाटियाँ धधक रही थीं, पर आग विनाशकारी नहीं थी—वह जागृत थी। आकाश में विशाल आकृतियाँ चक्कर लगा रही थीं। उनके पंखों की गति से बादल फट रहे थे। ड्रैगन।
उनमें से एक उसके सामने उतरा। उसकी आँखें लाल नहीं थीं—वे गहरी, स्थिर और पहचान से भरी थीं।
“तुम देर से आए हो,” वह बोला—शब्दों के बिना।
युवक कुछ कहना चाहता था, पर उसकी जीभ जमी हुई थी। तभी उसकी हथेली में तेज़ जलन उठी। आग भीतर से बाहर की ओर दौड़ी। पर्वतों के बीच गूँज उठी—एक धीमी, प्राचीन ध्वनि।
वह हड़बड़ाकर जाग गया। कमरा अंधेरे में डूबा था, पर उसकी साँसें गर्म थीं। पसीना माथे से टपक रहा था। उसने हथेली देखी—कोई चिन्ह नहीं, कोई घाव नहीं—पर त्वचा के नीचे धड़कती गर्मी थी, जैसे रक्त नहीं, अग्नि बह रही हो।
सुबह होने से पहले ही वह उठ गया। बिना सोचे वह नदी की ओर चल पड़ा। यह रास्ता उसने कभी नहीं चुना था, पर आज पैरों ने उसे चुना। नदी शांत थी, मगर उसकी सतह पर बिना हवा के लहरें उठ रही थीं।
उसने पानी में उँगलियाँ डुबोईं। क्षण भर को पानी सिसक उठा—भाप उठी—और फिर सब शांत। युवक पीछे हटा, दिल तेज़ धड़कने लगा। उसे लगा, जैसे नदी ने उसे पहचान लिया हो।
दूर पहाड़ियों के पार, ड्रैगन लोक में प्राचीन शिलाएँ काँप उठीं। वज्रनाग ने आँखें खोलीं। उसकी दृष्टि ने आकाश चीरते हुए मानव लोक को छुआ।
“अग्नि ने साँस ली है,” उसने धीमे कहा।
“स्मृति हिली है—पर अभी पूरी नहीं।”
कुछ ड्रैगन उत्साहित हुए, कुछ भयभीत। स्मृति का लौटना संतुलन को हिला सकता था।
छाया लोक में अंधकार ने भी हलचल महसूस की। वहाँ एक आकृति ने अपना रूप स्पष्ट किया—न पूर्ण, न अपूर्ण।
“इतनी जल्दी नहीं,” वह फुसफुसाई।
“अगर वह जागा, तो पहले रुकेगा।”
मानव लोक में युवक नदी से लौटा। रास्ते में एक सूखा पेड़ मिला—बरसों से मरा हुआ। उसकी जड़ों के पास मिट्टी नम थी, जैसे किसी ने भीतर से पानी भेज दिया हो। युवक ने पेड़ को छुआ। कुछ नहीं हुआ। फिर भी उसे लगा—कुछ होना टल गया है।
उसके भीतर एक आवाज़ उठी—न आदेश, न चेतावनी—
**अभी नहीं।**
शाम ढली। गाँव सामान्य था, पर उसे हर चेहरा थोड़ा अलग लगा—जैसे सब कुछ वही हो, पर अर्थ बदल गया हो। रात को आग जलाई गई। युवक पास बैठा रहा, पर उसने आग को नहीं छुआ। वह बस उसकी लपटों को देखता रहा—धैर्य से।
उसी रात सपना फिर आया। इस बार युद्ध नहीं था। एक गुरु खड़ा था—चेहरा धुंधला, आँखें स्पष्ट।
“शक्ति लौटेगी,” गुरु ने कहा,
“पर पहले तुम्हें उसे रोकना सीखना होगा।”
“क्यों?” युवक ने पूछा।
“क्योंकि जो शक्ति बिना रोक के उठती है,” गुरु बोला,
“वह रक्षा नहीं करती—वह दोहराती है।”
सुबह युवक की आँख खुली। हथेली की गर्मी स्थिर थी—तेज़ नहीं, कम नहीं। जैसे किसी ने भीतर अंगार सुलगा दिया हो और उसे बुझने से मना कर दिया हो।
ड्रैगन योद्धा अभी लौटा नहीं था।
पर उसकी साँस—
पहली,
गहरी,
और सचेत—
इस लोक में उतर चुकी थी।