Devil god cultivation love - Episode 1
Devil God Cultivation Love'रात का अंधकार पूरे पर्वतीय क्षेत्र पर छाया हुआ था।
आकाश में काले बादल गरज रहे थे। तेज़ हवाएं चट्टानों से टकराकर भयावह स्वर उत्पन्न कर रही थीं। ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के बीच फैली उस युद्धभूमि पर रक्त की नदियां बह रही थीं। चारों ओर बिखरे शव, टूटी हुई तलवारें और नष्ट हो चुकी आध्यात्मिक कलाकृतियां इस बात का प्रमाण थीं कि यहां कुछ समय पहले ऐसा भीषण युद्ध हुआ था, जिसे इतिहास सदियों तक याद रखेगा।
उसी रक्तरंजित पर्वत की चोटी पर एक युवती शांत भाव से खड़ी थी।
उसने प्राचीन शैली के श्वेत वस्त्र धारण किए हुए थे। बर्फ की तरह उज्ज्वल उसका रंग, कमर तक झरने जैसे लहराते लंबे केश, लाल कमल की पंखुड़ियों जैसे होंठ और अनुपम सौंदर्य... ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं स्वर्ग की कोई देवी पृथ्वी पर उतर आई हो।
उसकी आयु बाईस वर्ष से अधिक नहीं लगती थी।
किन्तु उसके सौंदर्य से भी अधिक भयावह थी उसकी शक्ति।
वह इस संसार की सबसे शक्तिशाली सम्राटों में से एक थी। उसके चारों ओर फैली हिम-शक्ति इतनी प्रबल थी कि आसपास का वातावरण तक जम चुका था।
उसके हाथ में एक दिव्य तलवार थी।
उसके पीछे अनेक महाशक्तिशाली योद्धा खड़े थे, लेकिन इस समय किसी की भी दृष्टि उन पर नहीं थी।
सभी की निगाहें उस व्यक्ति पर टिकी थीं, जो उस युवती के सामने घुटनों के बल बैठा था।
उसकी छाती के आर-पार दो तलवारें धंसी हुई थीं।
उसके पूरे शरीर से रक्त बह रहा था।
उसकी सांसें धीमी पड़ चुकी थीं, लेकिन उसकी आंखों में अब भी झुकने का नाम नहीं था।
कोई नहीं जानता था कि वह वास्तव में कौन था।
सभी उसे केवल एक नाम से जानते थे—
रक्तपिपासु...
युवती ने भावहीन दृष्टि से उसकी ओर देखा।
उसका चेहरा किसी बर्फ की मूर्ति की तरह निस्पंद था। ऐसा लगता था जैसे उसके भीतर कोई भावना शेष ही न हो।
कुछ क्षण बाद उसकी शीतल आवाज़ पूरे पर्वत पर गूंज उठी।
"तुमने इस संसार में अनगिनत निर्दोष लोगों की हत्या की है।"
"तुमने अनेक राज्यों में दंगे भड़काए।"
"तुमने कई संप्रदायों के निर्दोष साधकों, महिलाओं और बच्चों तक को बिना किसी कारण मृत्यु के घाट उतार दिया।"
"तुम एक खूनी पापी हो..."
"और ऐसे व्यक्ति को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"
उसके शब्द समाप्त होते ही उसके पीछे खड़े सभी योद्धा एक साथ चिल्ला उठे—
"इसे मार डालो!"
"ऐसा दानव जीवित नहीं रहना चाहिए!"
"इसने केवल आनंद के लिए लाखों लोगों का रक्त बहाया है!"
चारों ओर केवल एक ही आवाज़ गूंज रही थी—
"मृत्यु... मृत्यु... मृत्यु..."
उन सभी की आंखों में भय स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
कुछ ही दिन पहले इस व्यक्ति ने अकेले बीस संप्रदायों की संयुक्त सेना का सामना किया था।
दो लाख से अधिक साधक उसके विरुद्ध युद्धभूमि में उतरे थे।
लेकिन परिणाम...
इतिहास का सबसे भयावह नरसंहार बन गया।
उन दो लाख योद्धाओं में से डेढ़ लाख लोग उसके हाथों मारे जा चुके थे।
यदि अंतिम समय में संसार के महान सम्राट और यह हिम-सुंदरी वहां नहीं पहुंचते...
तो शायद आज वहां उपस्थित कोई भी व्यक्ति जीवित न बचता।
चार दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा।
धरती कांपती रही...
आकाश फटता रहा...
पहाड़ टूटते रहे...
लेकिन कोई भी उस व्यक्ति को पराजित नहीं कर सका।
फिर यह युवती युद्धभूमि में उतरी।
और तभी सभी ने एक विचित्र बात देखी।
उस व्यक्ति ने उसके विरुद्ध पूरे युद्ध में एक भी घातक प्रहार नहीं किया।
वह केवल बचाव करता रहा।
मानो उसके भीतर इस युवती पर तलवार उठाने की इच्छा ही न हो।
किसी को इसका कारण समझ नहीं आया।
लेकिन सब एक बात जानते थे...
यदि इस संसार में कोई उसे मार सकता था...
तो वह केवल यही बर्फ जैसी सुंदर सम्राज्ञी थी।
और अंत में वही हुआ।
उस व्यक्ति ने उसके सामने अपने सभी प्रतिरोध छोड़ दिए।
उसने स्वयं को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया।
यही उसकी हार का सबसे बड़ा कारण बना।
लेकिन...
क्यों?
यह प्रश्न आज भी वहां उपस्थित किसी व्यक्ति के पास नहीं था।
किसी को नहीं पता था कि उसकी आंखों में इतनी गहरी निराशा क्यों थी।
कोई नहीं जानता था कि इतना अपराजेय योद्धा एक स्त्री के सामने स्वयं घुटनों पर क्यों बैठ गया।
अचानक...
घुटनों के बल बैठा वह व्यक्ति ज़ोर से हंस पड़ा।
लेकिन वह हंसी नहीं थी...
वह टूटे हुए हृदय की अंतिम चीख थी।
उसकी आंखों में अथाह पीड़ा थी।
उसकी नाराज़गी किसी और से नहीं...
स्वयं अपने आप से थी।
भर्राई हुई आवाज़ में वह बोला—
"लाखों लोग..."
"लाखों रिश्तेदार..."
"लाखों देवता..."
"कोई भी इंसान को झुका नहीं सकता..."
"लेकिन..."
"एक वादा..."
"सिर्फ एक वादा..."
"पूरे जीवन को झुका सकता है।"
उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
एक आंसू उसकी पलकों से निकलकर रक्त से भीगी धरती पर गिर पड़ा।
"आज मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा पछतावा है..."
"मैंने वह वादा क्यों किया..."
"यदि वह वादा न होता..."
"तो आज मैं यहां न होता।"
उसकी आवाज़ और भी भारी हो गई।
"याद रखना..."
"इस संसार में किसी से कोई ऐसा वादा मत करना..."
"जिसके लिए तुम्हें स्वयं को मिटाना पड़े।"
"जब तक कोई मर नहीं जाता..."
"न कोई पूर्णतः अच्छा होता है..."
"और न कोई पूर्णतः बुरा..."
"इस संसार में केवल शक्ति ही सत्य है।"
"जो शक्तिशाली है..."
"उसी की बात धर्म कहलाती है।"
"जो शक्तिशाली है..."
"वही अपना कहलाता है।"
"जिस दिन तुम्हारी शक्ति समाप्त हो जाएगी..."
"उसी दिन अपने भी तुम्हें पराया समझने लगेंगे।"
उसने गहरी सांस ली।
फिर धीमी आवाज़ में एक शायरी कही—
"इन आंखों ने लाखों खुशियां देखी हैं,
पर उसकी मुस्कान कभी नहीं देखी।
हमने अपना सब कुछ लुटा दिया उसके लिए,
पर उसकी आंखों में अपने लिए एक मुस्कान नहीं देखी।
वह बातें बड़ी-बड़ी करती है इंसानियत की,
पर उसने कभी हमारे दिल के दर्द की कहानी नहीं देखी..."
शायरी समाप्त होते ही उसने पहली बार सीधे उस बर्फ-सी सुंदर युवती की आंखों में देखा।
उस व्यक्ति की आंखें सीधे उस बर्फ-सी सुंदर सम्राज्ञी की आंखों से मिलीं।
उन आंखों में न घृणा थी...
न क्रोध...
न ही अपने हत्यारों के प्रति कोई द्वेष।
वहां केवल अथाह प्रेम था...
ऐसा प्रेम, जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव था।
उसने कांपते हुए अपना दायां हाथ उठाया और धीरे से उसकी ओर इशारा किया।
फिर उसके होंठों पर जीवन की सबसे कोमल और सच्ची मुस्कान उभरी।
वह मुस्कान ऐसी थी, जिसे देखकर कोई भी यह विश्वास नहीं कर सकता था कि यह वही व्यक्ति है, जिसने कुछ समय पहले अकेले लाखों साधकों को युद्धभूमि में मौत के घाट उतार दिया था।
उसने धीमी, लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा,
"यह ज़िंदगी... तुम्हारी थी।"
"तुमने ले ली..."
"कभी अफ़सोस मत करना..."
यह कहते ही उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
उसकी पलकों से एक अंतिम आंसू टपका...
और अगले ही क्षण उसका शरीर पीछे की ओर झुक गया।
उसके पीछे हजारों मीटर गहरी एक प्राचीन खाई थी।
वह बिना किसी प्रतिरोध के उसी अथाह अंधकार में गिरने लगा।
हवा की तीव्र गर्जना उसके कानों में गूंज रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर अब भी वही शांत मुस्कान बनी हुई थी।
उधर...
उस बर्फ-सी सुंदर सम्राज्ञी का पूरा शरीर एक क्षण के लिए जड़ हो गया।
जब उस व्यक्ति ने अपनी उंगली से उसकी ओर इशारा किया...
तभी उसके मन में कोई बहुत पुरानी स्मृति कौंध गई थी।
एक ऐसा दृश्य...
जिसे वह वर्षों पहले भूल चुकी थी।
उसकी आंखों की पुतलियां अचानक फैल गईं।
पहली बार उसके भावहीन चेहरे पर घबराहट दिखाई दी।
वह एक कदम आगे बढ़ी...
लेकिन...
बहुत देर हो चुकी थी।
वह व्यक्ति पहले ही अंधेरी खाई में समा चुका था।
अब उसका कोई अस्तित्व दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ क्षणों तक पूरा पर्वत मौन रहा।
कोई कुछ नहीं बोला।
सभी केवल उस अथाह खाई की ओर देख रहे थे।
युद्धभूमि पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति बुरी तरह घायल था।
किसी की भुजा कटी हुई थी...
किसी का आध्यात्मिक आधार टूट चुका था...
तो किसी के शरीर पर तलवारों के इतने गहरे घाव थे कि उन्हें देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाते थे।
और उन सभी घावों का कारण केवल एक ही व्यक्ति था।
वह अकेला योद्धा।
किसी ने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि बीस महान संप्रदायों की संयुक्त सेना को एक अकेला व्यक्ति इस स्थिति तक पहुंचा देगा।
उन्होंने सोचा था कि इतनी विशाल शक्ति के सामने वह कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाएगा।
लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत निकला।
बीस संप्रदायों की वर्षों की मेहनत...
हजारों वर्षों में तैयार की गई उनकी नींव...
उनकी श्रेष्ठ प्रतिभाएं...
सब कुछ इस एक युद्ध में लगभग नष्ट हो चुका था।
यदि अंतिम समय में वह हिम-सम्राज्ञी युद्धभूमि में न आती...
तो शायद आज उन संप्रदायों का नामोनिशान भी मिट चुका होता।
लेकिन...
क्या वास्तव में वह व्यक्ति उतना ही दुष्ट था, जितना सब उसे बता रहे थे?
इस प्रश्न का उत्तर वहां उपस्थित किसी के पास नहीं था।
क्योंकि सत्य कुछ और था।
उस पर हमला इसलिए नहीं किया गया था कि वह पापी था...
बल्कि इसलिए किया गया था क्योंकि पूरे महाद्वीप में यह अफवाह फैल चुकी थी कि उसके पास एक प्राचीन विरासत, एक दिव्य ग्रंथ और ऐसी कलाकृतियां हैं, जो किसी भी साधक को संसार का सर्वोच्च शासक बना सकती हैं।
यही लालच इस महायुद्ध का वास्तविक कारण था।
बाकी...
धर्म, न्याय और निर्दोषों की रक्षा जैसी बातें केवल राजनीति और लोगों को एकजुट करने के लिए फैलाई गई अफवाहें थीं।
वहीं दूसरी ओर...
वह बर्फ-सी सुंदर सम्राज्ञी इन सब बातों से पूरी तरह अनजान थी।
उसे न उस विरासत के बारे में कोई जानकारी थी...
और न ही इस युद्ध के पीछे छिपे वास्तविक षड्यंत्र के बारे में।
वह केवल इतना जानती थी कि एक अकेला व्यक्ति हजारों लोगों का रक्त बहा रहा है।
उसे लगा...
ऐसे व्यक्ति को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।
इसी विश्वास के साथ उसने युद्ध में प्रवेश किया था।
लेकिन अब...