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Chapter 2

Devil god cultivation love - Episode 2

Devil God Cultivation Love'

जब उसे उस व्यक्ति का अंतिम इशारा याद आया...

जब उसकी आंखों में वह असीम प्रेम दिखाई दिया...

जब उसे याद आया कि पूरे युद्ध में उसने उसके विरुद्ध एक भी घातक प्रहार नहीं किया...

तब पहली बार उसके भीतर संदेह जन्मा।

उसके मन में एक ही प्रश्न बार-बार गूंजने लगा—

"क्या... मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी?"

उसने अनजाने में उसी व्यक्ति को अपने हाथों मार डाला था...

जिसकी वह वर्षों से तलाश कर रही थी।

उसका हृदय पहली बार बुरी तरह कांप उठा।

लेकिन अब...

सब कुछ समाप्त हो चुका था।

वह कुछ नहीं बोली।

किसी की ओर नहीं देखा।

बस धीरे-धीरे आकाश की ओर उठी और वहां से चली गई।

उसके जाने के साथ ही पूरे आकाश में भीषण हिम-तूफान उठ खड़ा हुआ।

बर्फ की असंख्य परतें पर्वतों पर गिरने लगीं।

किसी ने यह नहीं देखा...

कि उस सम्राज्ञी की आंखों से दो आंसू चुपचाप बह निकले थे।

उसके जाने के बाद शेष सभी संप्रदायों के लोग भी वहां से लौटने लगे।

किसी ने भी उस अथाह खाई में उतरने का साहस नहीं किया।

क्योंकि उस खाई का इतिहास पूरे महाद्वीप में प्रसिद्ध था।

कहा जाता था...

आज तक जो भी उस प्राचीन खाई में उतरा...

वह कभी जीवित वापस नहीं लौटा।

इसलिए सभी ने यह मान लिया कि उस व्यक्ति का अंत हो चुका है।

और जहां तक उस प्राचीन विरासत की बात थी...

अब किसी में उसे खोजने का साहस भी नहीं बचा था।

बीसों संप्रदाय इस युद्ध में लगभग अपंग हो चुके थे।

यदि इस समय बाहरी शक्तियों को उनकी वास्तविक स्थिति का पता चल जाता...

तो वे बिना देर किए उन पर आक्रमण कर देते।

इसलिए फिलहाल उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपनी शक्ति और व्यवस्था को दोबारा स्थापित करना था।

यहीं से...

एक ऐसी कहानी का अंत हुआ...

उस ग्रह से लाखों मील दूर, ब्रह्मांड के एक अन्य कोने में स्थित एक संसार था—

ब्लू स्टार ग्रह।

यह ग्रह बाहरी रूप से शांत दिखाई देता था, लेकिन इसके भीतर भी साधकों की एक विशाल दुनिया छिपी हुई थी।

इसी ग्रह पर स्थित था शक्तिशाली कुनलुन साम्राज्य।

रात का समय था।

आकाश में पूर्णिमा का चांद अपनी शीतल चांदनी बिखेर रहा था।

राजमहल के एक शांत कक्ष में लगभग सोलह वर्ष का एक युवक खिड़की के पास खड़ा चंद्रमा को निहार रहा था।

उसके चेहरे पर उसकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता दिखाई दे रही थी।

उसका नाम था...

आर्यन।

वह कुनलुन साम्राज्य का प्रथम राजकुमार था।

बाहरी दुनिया की नज़रों में वह एक साधारण राजकुमार था, लेकिन वास्तव में वह पिछले चार वर्षों से गुप्त रूप से साधना कर रहा था।

सिर्फ सोलह वर्ष की आयु में वह कोर गठन क्षेत्र तक पहुंच चुका था।

उसने अपनी साधना की बात आज तक किसी को नहीं बताई थी।

यहां तक कि उसके अपने परिवार को भी नहीं।

क्योंकि इस जन्म में उसने एक निर्णय लिया था—

वह कभी भी अनावश्यक रूप से स्वयं को दुनिया के सामने प्रकट नहीं करेगा।

अपने पिछले जीवन में उसने बहुत अधिक प्रसिद्धि, शक्ति और सम्मान प्राप्त किया था।

लेकिन अंत में...

उसी प्रसिद्धि ने उसे अकेला कर दिया।

जिसे वह अपना मानता था...

अंततः उसी के हाथों उसकी मृत्यु हुई।

इसी कारण अब उसे उन लोगों से घृणा होने लगी थी जो बाहर से धर्म और न्याय की बातें करते थे, लेकिन भीतर केवल स्वार्थ और लालच छिपाए रखते थे।

आर्यन अच्छी तरह समझ चुका था—

जितना कम लोग तुम्हारे बारे में जानेंगे, उतना ही सुरक्षित तुम्हारा जीवन रहेगा।

इसीलिए वह वर्षों से छिपकर साधना कर रहा था।

कुनलुन साम्राज्य के सम्राट सूर्यभान, जो आर्यन के पिता थे, स्वयं नवजात आत्मा क्षेत्र के शक्तिशाली साधक थे।

इस संसार में साधना के क्षेत्रों का क्रम इस प्रकार था—

शरीर संयोजक क्षेत्र...

ऊर्जा क्षेत्र...

परम क्षेत्र...

कोर गठन क्षेत्र...

गोल्डन कोर क्षेत्र...

नवजात आत्मा क्षेत्र...

संत क्षेत्र...

महान संत क्षेत्र...

प्राचीन संत क्षेत्र...

दिव्य प्रकाश लोक...

देव उत्पत्ति क्षेत्र...

यही इस संसार का सर्वोच्च क्षेत्र था।

जो साधक देव उत्पत्ति क्षेत्र तक पहुंच जाता, उसे इस संसार को छोड़कर एक और अधिक विकसित तथा उच्च लोक में प्रवेश करना पड़ता था।

इसी कारण प्रत्येक साधक का अंतिम लक्ष्य इसी क्षेत्र तक पहुंचना होता था।

इस समय आर्यन खिड़की के बाहर फैले चांदनी भरे आकाश को निहार रहा था।

उसकी आंखों में एक गहरी उदासी थी।

बार-बार उसके मन में वही अंतिम दृश्य उभर रहा था...

रक्त से लथपथ उसका शरीर...

छाती में धंसी दो तलवारें...

और उसके सामने खड़ी वह बर्फ-सी सुंदर सम्राज्ञी।

उसे यह अच्छी तरह पता था कि उसके प्राण उसी के हाथों गए थे।

लेकिन...

उसके मन में उसके प्रति न तो घृणा थी और न ही कोई शिकायत।

उसकी आंखों में आज भी केवल निर्मल प्रेम था।

वह हल्की-सी मुस्कान के साथ चांद को देखता रहा।

लेकिन उसी क्षण...

उसके शरीर से अनजाने में अत्यंत अराजक और भयावह आध्यात्मिक आभा बाहर निकलने लगी।

यदि कोई सामान्य साधक उस आभा के संपर्क में आ जाता...

तो केवल उसके दबाव से ही उसकी मृत्यु हो सकती थी।

आर्यन स्वयं भी उस आभा पर ध्यान नहीं दे पाया था।

तभी...

धड़ाम...!

अचानक उसके कक्ष का दरवाज़ा ज़ोरदार आवाज़ के साथ टूट गया।

आर्यन तुरंत पीछे मुड़ा।

उसने देखा—

दरवाज़े पर उसके पिता सूर्यभान खड़े थे।

उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

आर्यन एक पल के लिए हैरान रह गया।

"पिताजी...! क्या हुआ?"

सूर्यभान तेज़ी से उसके पास आए और उसे सिर से पांव तक देखने लगे।

फिर चिंतित स्वर में बोले,

"आर्यन... तुम ठीक तो हो न?"

आर्यन कुछ समझ नहीं पाया।

वह मुस्कुराकर बोला,

"मैं बिल्कुल ठीक हूं, पिताजी। मुझे क्या होगा?"

सूर्यभान ने गहरी सांस ली।

"अभी कुछ क्षण पहले मुझे यहां से अत्यंत भयावह और शक्तिशाली आभा का अनुभव हुआ था।"

"उस आभा में ऐसा दबाव था कि एक पल के लिए मुझे लगा जैसे कोई महान विशेषज्ञ महल के भीतर प्रवेश कर चुका हो।"

"इसलिए मैं बिना देर किए यहां चला आया।"

आर्यन ने सहज भाव बनाए रखते हुए कहा,

"लेकिन पिताजी... यहां तो मेरे अलावा कोई भी नहीं है।"

सूर्यभान ने पूरे कमरे पर एक बार फिर अपनी दिव्य चेतना फैलाई।

उन्हें वास्तव में वहां किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति महसूस नहीं हुई।

कुछ क्षण बाद उन्होंने निराश होकर सिर हिला दिया।

वह जानते थे कि आर्यन साधना नहीं कर सकता।

कम से कम उन्हें यही विश्वास था।

बचपन से आज तक आर्यन ने कभी अपने भीतर की शक्ति किसी को दिखाई ही नहीं थी।

सूर्यभान के मन में हमेशा एक अपराधबोध रहता था।

उन्हें लगता था कि यदि उनका पुत्र साधना नहीं कर पा रहा, तो कहीं न कहीं एक पिता के रूप में उन्हीं से कोई कमी रह गई है।

उन्होंने स्नेह से आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और कहा,

"बेटा... यदि तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, तो उसे अकेले मत सहना।"

"जब तक मैं जीवित हूं..."

"तुम्हें किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है।"

"तुम्हारे ऊपर आने वाली हर विपत्ति से पहले मुझे गुजरना होगा।"

पिता के इन शब्दों ने आर्यन के हृदय को छू लिया।

उसके भीतर एक अनोखी गर्माहट फैल गई।

पिछले जन्म में उसका कोई परिवार नहीं था।

न कोई अपना...

न कोई ऐसा, जो उसके लिए निस्वार्थ प्रेम रखता हो।

लेकिन इस जन्म में उसे एक ऐसा परिवार मिला था, जो बिना किसी स्वार्थ के उससे प्रेम करता था।

और यही कारण था कि वह इस परिवार को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था।

सूर्यवंशी राजवंश में आर्यन ही युवा पीढ़ी का एकमात्र उत्तराधिकारी था।

सूर्यभान के दोनों बड़े भाइयों ने अभी तक विवाह नहीं किया था।

इसलिए वे भी आर्यन को अपने पुत्र के समान स्नेह देते थे।

कुछ देर तक पिता-पुत्र सामान्य बातें करते रहे।

फिर सूर्यभान संतुष्ट होकर वहां से चले गए।

कक्ष में फिर से शांति छा गई।

आर्यन दोबारा खिड़की के पास जाकर चांद को निहारने लगा।

लेकिन इस बार...

उसकी आंखों में पहले से कहीं अधिक दृढ़ता थी।

उसे अपने पिछले जीवन की अधूरी कहानी को इस जन्म में पूरा करना था।

एपिसोड 1 — भाग 4

सूर्यभान के जाने के बाद कक्ष में एक बार फिर शांति छा गई।

आर्यन कुछ देर तक खिड़की के पास खड़ा चांदनी में डूबे आकाश को निहारता रहा। उसके मन में पिछले जन्म की अनगिनत यादें उमड़ रही थीं।

तभी उसे अपने पीछे किसी की आहट सुनाई दी।

वह बिना पीछे मुड़े ही हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

कुछ ही क्षणों बाद एक सुंदर युवती उसके पास आकर खड़ी हो गई।

उसका नाम प्रिया था।

प्रिया सूर्यवंशी परिवार की सदस्य नहीं थी। आर्यन केवल इतना जानता था कि उसका परिवार कोई साधारण परिवार नहीं है। उसके वास्तविक परिचय के बारे में उसने कभी जानने का प्रयास नहीं किया।

प्रिया कुछ क्षण तक चुपचाप आर्यन के साथ खड़ी रही। फिर आर्यन ने मुस्कुराकर पूछा,

"प्रिया, क्या आज तुम साधना नहीं करोगी?"

प्रिया ने अपनी मधुर आवाज़ में उत्तर दिया,

"बड़े भाई आर्यन, मैं आज की साधना पूरी कर चुकी हूँ। थोड़ा समय खाली था, इसलिए सोचा आपके साथ थोड़ा घूम आऊँ।"

उसके चेहरे पर मासूम मुस्कान खिल उठी।

आर्यन भी मुस्कुरा दिया।

"तो फिर चलो... आज मैं तुम्हें बाज़ार घुमा लाता हूँ।"

यह सुनते ही प्रिया का चेहरा खुशी से खिल उठा।

"सच, बड़े भाई?"

आर्यन ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

"हाँ, चलो।"

प्रिया बिना कुछ कहे खुशी-खुशी उसके साथ चल पड़ी।

दोनों कक्ष से बाहर निकले और साथ-साथ राजमहल के बाज़ार की ओर बढ़ गए।

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