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Chapter 9

मेरी बच्ची को बचा लो सर प्लीज

अपहरण चक्रव्यूह

Next day

अंश अपनी कुर्सी पर बैठा रिपोर्ट्स का इंतज़ार कर रहा था। उसकी नज़रें खिड़की के बाहर खेलते हुए मासूम बच्चों पर टिकी थीं, लेकिन दिमाग में बस कल रात अस्पताल ले जाई गई उस छोटी सी बच्ची का चेहरा था। वह पल-पल उसकी बेज़ुबान आँखों में छिपे डर और दर्द को महसूस कर रहा था।

तभी उसका मोबाइल बजा। अस्पताल से कॉल थी। "इंस्पेक्टर साहब, उस लड़की की रिपोर्ट आ गई है," नर्स ने दूसरी तरफ बताया।

अंश ने एक पल की भी देरी न करते हुए अपनी कार निकाली और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह जानता था कि यह रिपोर्ट ही उस बच्ची को न्याय दिलाने की पहली सीढ़ी है।

डॉक्टर शर्मा का चेहरा गंभीर था जब अंश उनके केबिन में पहुँचा। रिपोर्ट उनके हाथ में थी। अंश ने सीधे पूछा, "डॉक्टर साहब, रिपोर्ट में क्या आया है? जो मैं सोच रहा हूँ वो तो नहीं हुआ ना?" उसकी आवाज़ में एक इन्कार की, एक उम्मीद की किरण थी, जो शायद अब भी बची हुई थी।

डॉक्टर शर्मा ने एक गहरी सांस ली, आँखें बंद कीं, जैसे खुद को इस कठोर सच्चाई को कहने के लिए तैयार कर रहे हों। कुछ पलों के बाद उन्होंने आँखें खोलीं और सीधे अंश की आँखों में देखते हुए कहा, "अंश, तुम सही सोच रहे हो। रेप ही हुआ है इस बच्ची का।"

जैसे ही अंश ने डॉक्टर की यह बात सुनी, उसकी दुनिया थम सी गई। वह शब्द – 'रेप' – हवा में गूँजता रह गया। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और एक बूँद आँसू, जिसे वह काबू करने की पूरी कोशिश कर रहा था, अनियंत्रित होकर उसके गाल पर गिर गई। वह आँसू सिर्फ़ दुख का नहीं, बल्कि एक गहरी, सुलगती हुई गुस्से और असहायता का भी था।

उसने सोचा, "अभी वो बच्ची बहुत छोटी थी।" उसकी उम्र शायद उसके 12 se 13 होगी उस मासूम के साथ ऐसा जघन्य अपराध... यह सोचते ही अंश की आँखें फिर से नम हो गईं। उसने मुट्ठियाँ भींच लीं। न्याय मिलना अब सिर्फ़ एक केस नहीं, बल्कि उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी बन गया था।

डॉक्टर शर्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखा और गंभीर स्वर में कहा, "अंश, तुम्हें जल्दी से जल्दी उस हैवान को अरेस्ट करना होगा। मैं लड़की का मेडिकल रिपोर्ट के साथ-साथ फॉरेंसिक सैंपल भी तुरंत लैब भेज रहा हूँ। क्योंकि तुम्हें पता ही होगा कि लड़की के साथ क्या हो रहा होगा।"

डॉक्टर के इन शब्दों में एक डर था। वह डर कि अपराधी अभी आज़ाद घूम रहा है और हो सकता है वह दूसरी किसी मासूम का शिकार बना रहा हो। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। इतना कहकर डॉक्टर शर्मा वहाँ से चले गए, और अंश एक नई दृढ़ संकल्प के साथ थाने वापस लौट आया।

थाने पहुँचकर उसने तुरंत अपनी टीम को ब्रीफ किया और केस की तहकीकात तेज़ करने के आदेश दिए। वह अपनी कुर्सी पर बैठा ही था कि अचानक थाने का दरवाज़ा जोरों से खुला। एक औरत, जिसके चेहरे पर बेचैनी और डर साफ़ झलक रहा था, भागती हुई अंदर आई। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आँखें सूजी हुई थीं।

वह सीधे अंश के पास पहुँची और हाथ जोड़कर बोली, "साहब, मेरी बेटी को ढूंढ दो! प्लीज साहब! कल रात से ही वह घर नहीं आई है। उसका नाम प्रिया है। प्लीज साहब, मुझे मेरी बेटी सेफ वापस दे दो।" उसकी आवाज़ में एक माँ का सिसकता हुआ दर्द और गुहार थी।

अंश का दिल एक पल के लिए धड़क रह गया। अभी-अभी एक बच्ची के साथ हुए जघन्य अपराध का सदमा कुछ ही देर पहले लगा था, और अब एक और माँ की गुहार। कहीं यह कोई सिलसिला तो नहीं? कहीं कोई शैतान शहर में मासूम बच्चियों का शिकार तो नहीं कर रहा?

उसने तुरंत उठकर उस औरत को शांत करने की कोशिश की। उसने एक सिपाही को इशारा किया और खुद एक गिलास पानी लेकर उस माँ के पास गया। उसने नम्रतापूर्वक कहा, "पहले आप पानी पी लो, बैठ जाओ। आपकी बेटी कब गायब हुई? उसकी उम्र क्या है? आखिरी बार आपने उसे कहाँ देखा था? हर छोटी-बड़ी बात बताइए। चिंता मत कीजिए, हम अभी तलाश शुरू करते हैं।"

अंश जानता था कि अब वक्त कीमती था। एक तरफ एक बच्ची थी जो एक दरिंदगी का शिकार हो चुकी थी और उसे इंसाफ चाहिए, दूसरी तरफ एक बच्ची गायब थी जिसे बचाने के लिए हर सेकंड मायने रखता था। उसकी ड्यूटी और उसकी मानवता, दोनों ही अब इस मुहिम में उसके साथ थीं। यह लड़ाई सिर्फ़ कानून की नहीं, बल्कि नरपिशाचों के खिलाफ़ इंसानियत की लड़ाई थी।

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