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Chapter 3

Mafia forced bride - Chapter 3

Mafia forced bride

अपना ये रोने धोने का ड्रामा बंद करो और जल्दी से सर्वेंट के कपड़े पहनकर रेडी हो जाओ। फिर जाकर किचन में काम करो।

रुद्रांश की रौबदार आवाज़ पूरे हॉल में गूँज उठी। उसकी आवाज़ इतनी भारी और तेज़ थी कि मानो किसी ने लोहे की घंटी को ज़ोर से बजा दिया हो। उस आवाज़ में हुकूमत भी थी और तिरस्कार भी। सामने ज़मीन पर पड़ी चाशनी का दिल इस कदर काँप उठा मानो किसी ने उसके सीने पर पहाड़ रख दिया हो।

रुद्रांश ने एक पल भी इंतज़ार नहीं किया। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ़ झलक रहा था। उसकी आँखें लाल हो उठी थीं, और उसकी जबान से निकला हर शब्द किसी चाबुक की तरह चाशनी के नर्म दिल पर वार कर रहा था।

आशा आंटी!

जैसे ही यह नाम उसके मुँह से निकला, उसकी आवाज़ इतनी गूंजदार थी कि पूरी हवेली के कोने-कोने तक पहुँच गई। पलभर में सीढ़ियों से भागते हुए कदमों की आहट सुनाई दी। वह थीआशा आंटी।

आशा आंटी एक मध्यम आयु की औरत थीं। उनका चेहरा थकान और अनुभव दोनों से भरा था। जैसे ही उन्होंने रुद्रांश की पुकार सुनी, वे हाँफते हुए सामने आईं और झुककर बोलीं

जी बड़े बाबा।

उनकी आवाज़ में सम्मान भी था और डर भी।

रुद्रांश ने बिना समय गँवाए, अपने तेज़ स्वर में कहा

आपको एक मेड की ज़रूरत थी ना? तो ये रही वो मेड।

उसने अपने हाथ से ज़मीन पर बैठी चाशनी की ओर इशारा किया।

इस लड़की को सब कुछ सिखा दीजिए कि इसे क्या-क्या करना है। और हाँ, इसे मेड के कपड़े भी दे दीजिए।

उसके लहज़े में ऐसा आदेश था जिसे टालना नामुमकिन था। हर शब्द मानो पत्थर की दीवार पर कील ठोक रहा हो।

इतना कहकर रुद्रांश ने अपना चेहरा घुमाया और सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। उसके कदमों की आवाज़ भारी और सख्त थी। वो तेज़ी से चलता हुआ एक-एक सीढ़ी चढ़ता गया। उसके जूतों की टक-टक पूरे हॉल में गूंज रही थी। उसके पीछे हवेली का सन्नाटा और भी गहरा हो गया।

इधर, आशा आंटी कुछ क्षण तक वहीं खड़ी रह गईं। उनकी नज़रें उस जगह पर ठहर गईं जहाँ चाशनी गिरी पड़ी थी। चाशनी का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। उसके होंठ काँप रहे थे और उसकी आँखों में बेबसी थी। उसके पूरे अस्तित्व से दर्द झलक रहा था।

आशा आंटी का दिल पसीज गया। उनकी आँखें भी भर आईं। लेकिन वो जानती थीं कि इस विला में भावनाओं की कोई कीमत नहीं है। यहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ रुद्रांश की चलती है। उसके आदेश ही कानून हैं। उसकी इच्छा ही सबका सच है।

उनकी आँखों में नमी तैर आई, लेकिन उन्होंने जल्दी ही उसे छुपा लिया। उन्होंने गहरी साँस ली और नज़रें झुका लीं। क्योंकि वे जानती थीं, अगर उन्होंने अपनी सहानुभूति ज़ाहिर की तो शायद चाशनी की हालत और बिगड़ जाएगी।

चाशनी वहीं ज़मीन पर बैठी रही। उसकी आँखें बार-बार सीढ़ियों की ओर उठ रही थीं, जिनसे रुद्रांश अभी-अभी गुज़रा था। उसके दिल में तूफ़ान मचा हुआ था, लेकिन उसके शरीर में इतनी ताक़त नहीं बची थी कि वो बोल सके या उठ सके। उसके कानों में अब भी रुद्रांश की कठोर आवाज़ गूंज रही थी

अपना ये रोने धोने का ड्रामा बंद करो और जल्दी से सर्वेंट के कपड़े पहनकर रेडी हो जाओ।

हर शब्द उसके दिल में तीर की तरह चुभ रहा था। उसे लग रहा था मानो उसकी पहचान, उसकी इज़्ज़त और उसका वजूद सब कुछ छीन लिया गया हो।

आशा आंटी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके कदम भारी थे। उन्होंने एक पल के लिए चाशनी को देखा, फिर अपने आँसू रोकते हुए गहरी आवाज़ में बुदबुदाईं

हे भगवान इस बच्ची का क्या होगा।

लेकिन उनके होंठों पर निकली यह बात सिर्फ़ उनके दिल का बोझ हल्का करने का प्रयास था। वो जानती थीं कि सचमुच कुछ कर पाना उनके बस में नहीं।

विला का माहौल उस समय इतना भारी हो चुका था कि हर दीवार मानो गवाही दे रही थी। उस जगह का हर कोना जानता था कि यहाँ केवल एक ही इंसान की इच्छा चलती हैरुद्रांश की।

थके क़दमों से आशा आंटी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनका दिल किसी अजीब-सी बेचैनी से भरा हुआ था। सामने ज़मीन पर औंधे मुँह गिरी चाशनी पड़ी थी। उसका चेहरा आँसुओं से भीग चुका था। उसके बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे और होंठ काँप रहे थे।

आशा आंटी का दिल भर आया। उन्होंने काँपते हुए हाथ से चाशनी के कंधे को पकड़ा और धीरे से उसे उठाते हुए बोलीं

"उठो बेटा... आओ मेरे साथ।"

उनकी आवाज़ बेहद कोमल थी, जैसे कोई माँ अपनी घायल बच्ची को सहारा दे रही हो।

चाशनी ने आँसुओं से भरी आँखें उठाईं। उनमें दर्द, अपमान और थकान का समंदर था। उसने किसी तरह खुद को संभाला। उसके शरीर में इतनी ताक़त नहीं बची थी कि वो ढंग से चल सके। लेकिन फिर भी उसने हिम्मत जुटाई।

लड़खड़ाते क़दमों से वह आशा आंटी के साथ चल पड़ी। उसके हर क़दम पर दर्द उसकी नसों में दौड़ जाता था। जैसे ही वह नीचे की ओर बढ़ी, उसके पैरों से खून की बूँदें गिरने लगीं।

उसके पैर बुरी तरह छिल गए थे। गिरने के कारण उनमें सूजन भी आ चुकी थी। हर कदम उसके लिए एक सज़ा बन गया था।

उसके हाथों की हालत भी कुछ कम नहीं थी। गिरने पर उसकी चूड़ियाँ टूट गई थीं और उन काँच के टुकड़ों ने उसकी हथेली को काट दिया था। अब भी वहाँ से खून रिस रहा था। दर्द से उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने उसे सह लिया। उसकी आँखों से आँसुओं की लकीरें लगातार बह रही थीं।

आशा आंटी का दिल यह सब देखकर तड़प उठा। पर वो जानती थीं, उनके हाथ बँधे हुए हैं। इस हवेली में रुद्रांश का हुक्म ही सब कुछ था। उन्होंने गहरी साँस ली और चुपचाप चाशनी का हाथ थामकर उसे सर्वेंट क्वार्टर की तरफ़ ले जाने लगीं।

हवेली के पिछले हिस्से में, बिल्कुल किनारे पर बने थे सर्वेंट क्वार्टर। वहाँ का माहौल अलग ही था , छोटे-छोटे कमरे, जिनमें न रोशनी ठीक से आती थी और न हवा। जैसे ही चाशनी वहाँ पहुँची, उसे एक अजीब-सी घुटन महसूस हुई।

कमरे के भीतर पहुँचते ही आशा आंटी ने फुर्ती से अलमारी खोली और पट्टी का डिब्बा निकाला। उन्होंने जल्दी से चाशनी को पास बैठाया और उसके पैरों और हाथों पर पट्टी बाँधने लगीं।

उनके हाथ काँप रहे थे, लेकिन वह पूरी सावधानी से काम कर रही थीं। चाशनी ने जब अपने पैरों पर पट्टी बँधते देखी, तो उसकी आँखें और भी भर आईं। उसे एहसास हो रहा था कि किस तरह उसकी ज़िंदगी एक ही पल में बदल गई है।

जब पट्टी पूरी हो गई, तो आशा आंटी ने एक साफ़ कपड़ा उसकी ओर बढ़ाया। उनकी आवाज़ में जल्दबाज़ी थी, लेकिन साथ ही अपनापन भी

"ये लो बेटा... इसे जल्दी से पहन लो और किचन में आ जाओ। इससे पहले कि बड़े बाबा आ जाएँ और वो तुम्हें वहाँ न देखकर गुस्सा करें।"

उनकी आँखों में डर साफ़ झलक रहा था। वह जानती थीं कि अगर रुद्रांश ने चाशनी को किचन में न पाया, तो उसका गुस्सा फिर किस कदर टूटेगा, कोई नहीं जानता।

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