Mafia forced bride - Chapter 4
Mafia forced brideचाशनी ने कपड़े दोनों हाथों से लिया। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने नम आँखों से आशा आंटी की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँपते हुए खुले और धीमी आवाज़ में बोली—
"ठीक है आंटी... मैं आ जाऊँगी।"
उसकी आवाज़ बेहद टूटी हुई थी, जैसे किसी ने उसका आत्मविश्वास और हौसला छीन लिया हो।
इतना कहकर चाशनी कपड़े लेकर वॉशरूम की ओर चली गई। उसके क़दम डगमगा रहे थे। हर क़दम उसके दर्द को और बढ़ा रहा था। लेकिन वह चुप रही। उसने अपने आँसुओं को अब रोक लिया था, क्योंकि उसे समझ आ चुका था कि इस घर में उसके आँसू किसी को दिखाई तो देंगे, लेकिन किसी को महसूस नहीं होंगे।
वॉशरूम का दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया। अंदर से कपड़े बदलने की आहटें आने लगीं।
बाहर, आशा आंटी खामोश खड़ी रहीं। उनकी आँखों में उदासी गहरी हो गई थी। उन्होंने एक लंबी साँस छोड़ी और सिर झुकाकर बुदबुदाईं—
"हे भगवान... ये बच्ची कितना कुछ सह रही है।"
फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने क़दम किचन की ओर बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर बेबसी की रेखाएँ और गहरी हो गई थीं।विशाल-सा मैंशन शांत खड़ा था। ऊँची-ऊँची दीवारें और भीतर का सन्नाटा एक अजीब-सी ठंडक फैला रहे थे। विला की भव्यता के बीच नीचे बने सर्वेंट क्वार्टर से निकलकर चाशनी ने अपने तन पर मेड के कपड़े डाल लिए थे। सादा-सा कॉटन का फ्रॉक जिसके किनारों पर हल्की-सी लेस थी पर उस पर न तो कोई शान थी और न ही कोई चमक। ये कपड़े उसके लिए किसी कैद की वर्दी जैसे थे। उसने अपने आँसू पोंछ लिए थे चेहरा बिल्कुल सपाट बिना किसी भाव के। मानो अब उसकी आत्मा ने रोना छोड़ दिया हो।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई वह किचन में पहुँची। वहाँ पहले से कई मेड्स काम कर रही थीं कोई सब्ज़ियाँ काट रही थी कोई रोटियाँ बेल रही थी कोई बर्तनों की खनखनाहट में व्यस्त थी। चाशनी भी उनके साथ जाकर चुपचाप खड़ी हो गई। आशा आंटी ने हल्की-सी नज़र उस पर डाली फिर धीमे स्वर में कहा "काम में लग जाओ बेटा... ज्यादा सोचो मत।"
चाशनी ने सिर झुका लिया। उसने बिना कुछ कहे बर्तनों को उठाना शुरू कर दिया। उसके हाथों में अभी भी चोट के निशान थे पैरों में सूजन पर फिर भी वह चुप रही। उसकी आँखें बिल्कुल बेजान थीं।
कुछ देर बाद मैंशन की बड़ी-सी डाइनिंग टेबल पर सारे लोग एक-एक करके आकर बैठ गए। टेबल सोने की बॉर्डर से सजी हुई थी जिस पर सफ़ेद शीट और बीच में ताज़े फूलों का गुलदस्ता रखा था। कुर्सियाँ ऊँची और शाही दिख रही थीं। टेबल के बिल्कुल हेड पर धीमे और रौबदार कदमों से रुद्राक्ष आया और अपनी जगह पर बैठ गया। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह ठंडा और कठोर भाव था।
बाकी लोग भी अपनी-अपनी जगहों पर बैठ गए। चारों तरफ़ सन्नाटा था सिर्फ़ कुर्सियों को खींचने और रखने की आवाज़ गूँज रही थी।
थोड़ी ही देर में मेड्स ने एक-एक करके डाइनिंग टेबल पर खाना सजाना शुरू कर दिया। चमचमाती प्लेटें गरम-गरम व्यंजन और नाश्ते की महक पूरे हॉल में फैल गई। चाशनी भी उन मेड्स में शामिल थी। वह ट्रे में रखे गिलास धीरे से टेबल पर रख रही थी। उसका सिर अब भी झुका हुआ था।
रुद्राक्ष ने अपनी आदत के मुताबिक़ बड़े ही सिस्टमैटिक ढंग से शुरुआत की। सबसे पहले उसने अपने पास रखे टॉवेल को उठाया और बेहद नपी-तुली हरकत में उसे अपने पैरों पर रखा। फिर उसने सफ़ेद नैपकिन को उठाया और गले पर पिन कर दिया।
इसके बाद उसने प्लेट की ढक्कनें एक-एक करके खोलीं। महक उठी पोहा उपमा पराठे जूस और साथ में फल। एक मेड ने आगे बढ़कर पोहा उसकी प्लेट में सर्व किया।
रुद्राक्ष ने चम्मच उठाया पोहे को हल्के से मिलाया और एक कौर उठाकर मुँह में डाल लिया। जैसे ही पहला कौर उसके गले से नीचे गया अचानक उसके चेहरे की रंग बदल गई। उसकी आँखें सिकुड़ गईं माथे पर लकीरें खिंच गईं और अगले ही क्षण उसके मुँह से तेज़ आवाज़ निकाल
पूरे हॉल में उसकी चीख गूँज गई। सबकी नज़रें अचानक उसी पर टिक गईं। रुद्राक्ष ने झटके से पानी का गिलास उठाया और एक घूँट में पी गया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने जोर से चिल्लाया
"आशा आंटी! आशा आंटी!"
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरे मैंशन की दीवारें हिल गईं। सब लोग घबरा गए।
तभी दरवाज़े से तेज़ी से आती हुई आशा आंटी वहाँ पहुँचीं। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी। उन्होंने हाथ जोड़कर झुकते हुए कहा "जी बड़े बाबा बोलिए... क्या बात है?"
रुद्राक्ष ने गुस्से से अपनी प्लेट की ओर इशारा किया और गरजते हुए बोला "ये पोहा किसने बनाया है? इसमें इतनी मिर्च किसने डाली है? ज़रा चखा तो सही... आग लग रही है मुँह में!"
पूरा हॉल सन्न रह गया। बाकी मेड्स एक-दूसरे को देखने लगीं। उनके चेहरों पर डर और घबराहट साफ़ झलक रही थी।
आशा आंटी ने धीरे से जवाब दिया पर... बाबा इसमें तो इतना मिर्च नहीं है। सुबह मैंने खुद चखा था।"
रुद्राक्ष ने गुस्से से कुर्सी पर हाथ पटका। उसकी आवाज़ और भी भारी हो गई।
"आशा आंटी अब आप मुझे बताएंगी कि इसमें मिर्च है या नहीं? आप भूल गई हैं शायद... मुझे ज़्यादा तीखा बिल्कुल पसंद नहीं। और आप कह रही हैं कि इसमें मिर्च नहीं है?!"
उसकी आँखें आग उगल रही थीं। उसके चेहरे पर ग़ुस्सा इतना भयानक था कि सबकी साँसें थम गईं। निया ने डरते हुए उसके कंधे को छुआ और बोली
"भाई... आप शांत हो जाइए। हो सकता है गलती से थोड़ा ज़्यादा पड़ गया हो।"
लेकिन रुद्राक्ष का ग़ुस्सा किसी के कहने से थमने वाला नहीं था। वह खड़ा हो गया उसकी ऊँची आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।
"मुझे इस तरह की लापरवाही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं! जिस घर में मेरे हिसाब से सब चलता है वहाँ मेरी प्लेट में ये सब कैसे आ सकता है?"
उसके शब्दों ने हवा को काट दिया। आशा आंटी सिर झुकाए खड़ी रहीं। उनकी आँखें नम हो गईं पर वो कुछ कह नहीं सकीं। कमरे की हर नज़र अब उन्हीं पर और चाशनी पर टिक गई थी।
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