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Chapter 1

Manav Aur Jadui Academy - Chapter 1

Manav Aur Jadui Academy

आसमान में अँधेरा छा गया था। सूरज किसी चीज से ढक गया था, वो चाँद था। अचानक सूर्यग्रहण हो गया।

"वाह!"

"आसमान की तरफ देखो!"

मानव के आसपास के लोग एक साथ हैरान और उत्साहित थे। ऐसा लग रहा था, जैसे रात हो गई हो। मौसम तेजी से बदल रहा था, और ठंडी हवाएँ चलने लगी थीं।

मानव ने उत्सुकता से अपनी घड़ी देखी।

9:24।

वो नौकरी के इंटरव्यू के लिए पहले ही लेट हो चुका था, और फिर ये सूर्यग्रहण हो गया।

मानव पूरी रात चिंता में सो नहीं पाया था। नाश्ता भी ठीक से नहीं किया। घर से निकलने के बाद उसे याद आया कि वो कुछ जरूरी कागजात भूल गया था। उन्हें लेने के लिए उसे वापस घर जाना पड़ा। इसीलिए इतनी देर हो गई।

और जब वो ठीक समय पर पहुँचने वाला ही था, तभी गाड़ियाँ और लोग रुक गए। रास्ता बंद हो गया। वजह? अचानक सूर्यग्रहण।

'मैं उन्हें बस यही कहूँगी कि मैं इस ग्रहण की वजह से फँस गई थी...'

मन में कुछ बहाने बनाते हुए, मानव ने उस पुल के नीचे पानी में आसमान का प्रतिबिंब देखा, जिस पर वो खड़ा था। वो दुखी था, लेकिन सामने का नजारा देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। आखिर, पूर्ण सूर्यग्रहण देखना कमाल का अनुभव था।

'ये कितना सुंदर है...'

उस अँधेरे में सिर्फ सूरज का कोरोना दिख रहा था, जिससे हल्की-सी रोशनी निकल रही थी। उस रोशनी से आसपास का छोटा-सा हिस्सा जगमगा रहा था। मानव को तापमान में भारी गिरावट महसूस हुई। वो जानता था कि ये सूर्यग्रहण का आम असर है।

नजारा देखते हुए उसकी नजर किसी चीज पर पड़ी।

'वो क्या है...'

उसने ऊपर देखा। दूर क्षितिज पर, एक विशाल चीज धीरे-धीरे नजर आ रही थी। वो बहुत बड़ी थी। ऐसा लग रहा था, जैसे आसमान में कोई बड़ा ग्रह उभर आया हो। नहीं... वो सचमुच एक ग्रह था, जो कुछ सेकंड पहले वहाँ था ही नहीं।

सूरज अभी भी ढका हुआ था, जिससे धरती पर कोई रोशनी नहीं थी। कुछ ही पलों में, बड़ी-बड़ी चीजें नजर आईं और एक-एक करके पूरे आसमान को ढक लिया।

ये ऐसा नजारा था, जैसे साइंस-फिक्शन फिल्म में देखते हैं। जितना शानदार, उतना ही डरावना।

मानव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके शरीर में अजीब-सा डर समा गया।

'...ये क्या बकवास है...'

अचानक धरती हिलने लगी। पुल के नीचे का पानी भी हिलने और उछलने लगा। हर पल कंपन और तेज हो रहा था।

ऊँची इमारतें झुक गईं और ढह गईं। पेड़ गिर गए, सड़कें टूट गईं। तेज हवाओं ने सब कुछ उड़ा दिया। हर तरफ से धमाकों की आवाजें गूंजने लगीं।

लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले एक ताकत ने उन्हें ऊपर की ओर खींचना शुरू कर दिया, जैसे गुरुत्वाकर्षण उलट गया हो।

"क्या? क्या?"

"क्या हो रहा है?!"

लोग चीख रहे थे, कुछ पकड़कर खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे। मानव ने भी पुल की रेलिंग पकड़ ली। डर और हैरानी में डूबा, उसने कारों, लोगों, पानी और हवा में तैरती चीजों को देखा। ऐसा नहीं था कि गुरुत्वाकर्षण खत्म हो गया था, बल्कि ऐसा लग रहा था, जैसे धरती के गुरुत्वाकर्षण पर कोई और बड़ी ताकत हावी हो रही हो।

'आखिर क्या हो रहा है?'

जिस रेलिंग को वो पकड़े हुए था, वो मुड़ गई और उसका एक किनारा टूट गया। मानव को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसका दिमाग सुन्न हो गया था। इंटरव्यू की बात भी दिमाग से निकल गई थी।

ऊपर की ओर खींचने वाली ताकत और तेज हो रही थी। उसने पूरी ताकत लगाकर खुद को जमीन पर टिकाने की कोशिश की, लेकिन कुछ काम नहीं आया। उसके कानों में भारी दबाव और पूरे शरीर में तेज दर्द होने लगा। पाँच सेकंड भी नहीं बीते, लेकिन मानव और बाकी लोगों को लगा, जैसे सदियाँ बीत गई हों।

साँस लेना मुश्किल हो गया। हर साँस के साथ छाती में दर्द होता। उसका शरीर ऐसा दर्द कर रहा था, जैसे फट जाएगा। मानव को लगा कि उसकी पलकें भारी हो रही हैं और सब कुछ धुंधला हो गया है।

जैसे ही वो आँखें बंद करने वाला था, उसने एक रोशनी देखी। एक सुंदर, गहरे भूरे रंग की गोलाकार रोशनी उसके सामने तैर रही थी। वो रोशनी उसके शरीर के चारों ओर घूमने लगी। जैसे ही वो उसकी त्वचा से टकराई...

'हंह...?'

सब कुछ शांत हो गया। आसपास की हलचल, खींचने वाली ताकत, तैरती चीजें—सब गायब हो गया। मानव ने देखा कि जहाँ वो तैर रहा था, वहाँ दरारें पड़ने लगीं। छोटी-छोटी दरारें बड़ी होती गईं और उसके आसपास का पूरा स्थान अजीब दरारों से भर गया।

'…'

और फिर... सब कुछ सफेद हो गया।

*****

मानव ने आँखें खोलीं। सामने एक सफेद छत दिखी।

'…'

वो उछलकर बिस्तर पर बैठ गया। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने अपनी छाती पकड़ी और गहरी साँसें लेने की कोशिश की। उसके कपड़े पकड़े हाथ काँप रहे थे, और शरीर ठंडे पसीने से भीग गया था।

'वो... एक... सपना था...?!'

मानव ने अपने हाथ देखे। उसे यकीन था कि रेलिंग पकड़ने और तैरती चीजों से उसे चोट लगी होगी। लेकिन उसके शरीर में कोई दर्द या चोट नहीं थी।

हाँ, बिलकुल सपना। सूर्यग्रहण, ग्रह, दरारें? ये क्या बकवास है! ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता।

उसने धीरे-धीरे इन विचारों से खुद को शांत किया और ठीक से सोचने की कोशिश की।

'मैं कब सो गया?'

उसे याद था कि वो पूरी रात छत को घूरता रहा था।

"मानव! तुम जाग गए! तुम ठीक हो?"

"वाह!"

मानव को जैसे दिल का दौरा पड़ गया! एक आदमी उसके बिस्तर के पास बैठा था!

'तू मेरे कमरे में क्या कर रहा है?' वो ये कहना चाहता था, लेकिन बोलने से पहले ही रुक गया।

"क्या हुआ? तुम्हें बहुत पसीना आ रहा है... वैसे, डॉक्टर ने कहा था कि कोई दिक्कत नहीं है!"

तभी मानव को एहसास हुआ कि वो अपने कमरे में नहीं, कहीं और था। उसने इधर-उधर देखा। ये जगह कुछ जानी-पहचानी नहीं लग रही थी...

"हॉस्पिटल?"

"ये अकादमी का हॉस्पिटल है।"

"अकादमी...?"

"तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?"

सामने खड़ा लड़का चिंतित और उलझन में दिख रहा था। वो खड़ा हुआ और एक कदम करीब आया। अब मानव उसका चेहरा साफ देख पा रहा था। सुनहरे बाल, नीली आँखें, ऐसा खूबसूरत चेहरा जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।

'रुको, ये मेरा नाम कैसे जानता है?'

"..."

"चिंता मत करो। कोई गंभीर चोट नहीं है। और, उन्होंने कहा कि तुम ठीक होने के बाद फिर से परीक्षा दे सकती हो।"

"..."

'ये कौन है? कौन सी परीक्षा?... रुको... परीक्षा? अरे नहीं, मेरा इंटरव्यू!'

मानव घबराकर बिस्तर से उछला। उसने दीवार पर लगी घड़ी देखी। 11:35... बहुत देर हो चुकी थी! वो इतना जरूरी इंटरव्यू कैसे भूल गया?

'मैं... अब... अब क्या करूँ? मेरा एकमात्र नौकरी का मौका...'

मानव फिर से बिस्तर पर लेट गया।

वो बहुत खुश था कि ढेर सारी कम तनख्वाह वाली पार्ट-टाइम नौकरियों के बाद आखिरकार उसे अच्छी नौकरी और तनख्वाह मिलने वाली थी। उसे लगा था कि उसका बटुआ फिर से चमकेगा। लेकिन अब, किसी अज्ञात वजह से, वो किसी अनजान जगह पर था और इंटरव्यू छूट गया था।

मानव ने माथा पकड़ लिया। उसे हल्का सिरदर्द और चक्कर महसूस हो रहा था।

'क्या हो रहा है? कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं हॉस्पिटल में क्यों हूँ... उम... हॉस्पिटल में?'

"अरे, क्या हुआ? तबियत ठीक नहीं है? नर्स को बुलाऊँ?"

मानव ने फिर उस लड़के की तरफ देखा। जब कुछ समझ न आए, तो किसी जानकार से पूछ लेना चाहिए! मानव ने ऐसा ही करने का फैसला किया।

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या कह रहे हो। ये जगह कौन सी है, और तुम कौन हो?"

उसने जितना हो सके, विनम्रता से पूछा।

"..."

"महोदय?"

"...हुह?"

लड़के ने उसे बेवकूफी भरी नजरों से देखा।

"मुझे डर है कि मैंने तुम्हें पहले कभी नहीं देखा, लेकिन तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?"

मानव ने फिर विनम्रता से पूछा।

"..."

'अरे! इस लड़के को क्या हो गया?'

"उम... सर?"

"...मानव?"

"हाँ, ये मेरा नाम है, और तुम इसे कैसे जानते हो?"

वो लड़का, जो उसे हैरानी से देख रहा था, अचानक हँस पड़ा।

"उफ! वाह! कमाल की एक्टिंग! तुमने मुझे लगभग पकड़ लिया! लेकिन तुम्हें सचमुच नर्स से मिलना चाहिए। रुको, मैं बुलाता हूँ।"

'क्या? अरे! यार!'

मानव को कुछ समझ नहीं आया। उसने कई बातें सोचीं, लेकिन कुछ निष्कर्ष नहीं निकला।

वो लड़का कौन था? यहाँ क्यों था? मानव इतना अमीर भी नहीं था कि ये मान ले कि उसका अपहरण हुआ है!

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