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Chapter 5

Romantic Fougi - Chapter 5

Romantic Fougi

जया ने मुड़कर उस कागज पर नजर डाली जो विक्रम लिख रहा था।

"हूँ, तो तुमने तलाक की अर्जी लिखनी शुरू भी कर दी!" उसने हल्का व्यंग्य करते हुए कहा।

उसने देखा कि विक्रम की लिखावट बहुत ही सुंदर थी—मोतियों जैसी साफ, प्रवाहपूर्ण और दमदार।

जया की बात सुनकर विक्रम ने लिखना रोका और ऊपर देखा। उसकी आंखों में हैरानी थी।

"तुम पढ़ सकती हो?"

जया हंस पड़ी। "कैसी अजीब बात करते हो! मैं कोई पुराने जमाने की औरत थोड़ी हूं। आजकल कौन सा ऐसा जवान इंसान है जो पढ़ना-लिखना नहीं जानता?"

लेकिन यह कहते ही उसे अचानक याद आया—'अरे नहीं!'

इस शरीर की असली मालकिन यानी 'पुरानी जया' तो सिर्फ पहली कक्षा तक ही स्कूल गई थी। उसके बाद बीमारी की वजह से उसकी पढ़ाई छूट गई थी और वह दोबारा कभी स्कूल नहीं गई। मतलब, 'पुरानी जया' पूरी तरह अनपढ़ थी।

यहां तक कि उसने और विक्रम ने अपनी शादी के कागजों पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे, बस अंगूठा लगाया था!

अपनी गलती का अहसास होते ही जया ने तुरंत बात संभाली:

"मेरा मतलब... जाहिर है, मैं बहुत ज्यादा पढ़ना-लिखना नहीं जानती। लेकिन ये शब्द आसान हैं, इनकी बनावट सरल है, इसलिए मैं इन्हें पहचान लेती हूं!"

विक्रम ने उसकी इस सफाई पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने नजरें फेर लीं और गंभीरता से अपनी रिपोर्ट लिखने में जुट गया।

जया को दिन वाली बात याद आई—विक्रम ने कहा था कि वह रिपोर्ट में 'सच' बताएगा।

उसे डर लगा कि कहीं विक्रम इसमें उसके जुए और बच्चे को बेचने वाली बात न लिख दे। अगर ऐसा हुआ तो तलाक के साथ जेल पक्की थी। अपनी तसल्ली के लिए वह थोड़ा झुकी और चुपके से कागज में झांकने लगी।

पढ़कर उसने राहत की सांस ली। विक्रम ने उसके जुए या बच्चे वाली बात का जिक्र नहीं किया था। उसने वजह में सिर्फ इतना लिखा था कि 'पति-पत्नी के विचार नहीं मिलते' और वे 'बेमेल' हैं।

जया ने एक पल सोचा और धीरे से आह भरी।

"मैं तुम्हें एक सलाह दूं? इसे ऐसे मत लिखो," उसने कहा।

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विक्रम ने सिर उठाकर उसे देखा। उसकी नजरों में सवाल था—'क्यों?'

जया ने समझाया, "मैं यह तुम्हारे भले के लिए कह रही हूं। मैंने सुना है कि फौज में शादी और तलाक के नियम बहुत सख्त होते हैं। इतनी आसानी से तलाक नहीं मिलता, ऊपर से जांच भी होती है।"

विक्रम ने सहमति में सिर हिलाया। "शादी कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं है। जब तक कोई बहुत ठोस वजह न हो, फौज तलाक की मंजूरी नहीं देती।"

फिर उसने जया को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "खासकर तुम्हारे जैसी महिला के लिए, जिसके पास न कोई सरकारी नौकरी है, न जमीन-जायदाद और न ही कमाई का कोई जरिया। ऐसे में वे तुम्हें बेसहारा नहीं छोड़ेंगे, इसलिए मंजूरी मिलने के चांस और भी कम हैं।"

जया फीका सा हंसी। "तुम जरूरत से ज्यादा ईमानदार हो!"

"अगर तुम सिर्फ यह लिखोगे कि हमारे 'विचार नहीं मिलते', तो अर्जी खारिज हो जाएगी। इसकी जगह... यह लिखो कि मुझे तुम्हारे बेटे से नफरत है। लिखो कि मैं सौतेली मां बनकर उसे प्रताड़ित करती हूं और मैं उस बच्चे के साथ एक छत के नीचे शांति से नहीं रह सकती।"

विक्रम ने अचरज से उसे देखा। "क्या तुम जानती हो तुम क्या कह रही हो? इससे तुम्हारी बदनामी होगी। समाज में कोई तुम्हारी इज्जत नहीं करेगा।"

जया ने मन ही मन सोचा—'कितना भला आदमी है यह। मुझे छोड़ने जा रहा है, फिर भी मेरी इज्जत की परवाह कर रहा है।'

उसने सिर हिलाया और बेफिक्री से कहा, "कोई बात नहीं। वैसे भी मेरी इज्जत बची ही कहां है? तुम बेझिझक लिख दो!"

फिर उसने गंभीर होकर कहा, "अगर तुम जुए और बच्चे को बेचने वाली बात नहीं लिख रहे, तो यही मेरे लिए तुम्हारी तरफ से बहुत बड़ी दया है। बदले में मैं इतना तो कर ही सकती हूं।"

विक्रम उसे देखता रह गया।

अचानक उसे महसूस हुआ कि आज यह औरत अपनी पुरानी फितरत से बिल्कुल अलग है। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या बदला है, लेकिन कुछ तो बदला था।

खैर, उसने अपने विचारों को झटक दिया।

चाहे वह कितनी भी बदल गई हो, उसने उसके बेटे रोहन को बेचने की कोशिश की थी। यह एक ऐसा गुनाह था जिसे माफ नहीं किया जा सकता था। इसलिए, तलाक तो होकर ही रहेगा!

उसने जया की सलाह मानी और कागज फाड़कर नई अर्जी लिखी। इस बार उसने वजह बदल दी।

जया चुपचाप देखती रही, उसने अब कुछ नहीं कहा।

...

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उस रात, विक्रम उसी कमरे में छोटे वाले पलंग पर सोया।

वह 6 फीट लंबा तगड़ा फौजी था, और वह पलंग बमुश्किल 5 फीट का रहा होगा। उसे उसमें फिट होने के लिए खुद को सिकोड़ना पड़ रहा था। वह नजारा काफी असहज था।

दोनों के बीच रात भर कोई बात नहीं हुई।

अगले दिन सुबह, बाहर बजते फौजी बिगुल की आवाज से जया की आंख खुली।

वह बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन सिर में तेज चक्कर आया। कमजोरी इतनी थी कि वह वापस बिस्तर पर गिर गई।

कुछ देर बाद विक्रम नाश्ता लेकर आया। जया खिड़की से बाहर लाल ईंटों वाली दीवार को एकटक देख रही थी, जैसे उसमें कुछ ढूंढ रही हो।

नाश्ते में वही फीका खाना था—एक कटोरी पतला दलिया और उबली हुई पत्तागोभी के साथ दो सादे बन

दो बार यही खाना खाने के बाद जया को अब उस रूखेपन और गले में चुभने वाले निवालों की आदत हो गई थी।

विक्रम ने नाश्ता मेज पर रखा और बिना एक शब्द बोले वहां से चला गया। उसका व्यवहार ऐसा था जैसे वे दोनों पति-पत्नी नहीं, बल्कि पूरी तरह अजनबी हों।

दोपहर हो गई।

जया को उम्मीद थी कि विक्रम खाना लेकर आएगा, लेकिन वह नहीं आया।

उसकी जगह दरवाजा खुला और स्नेहा अंदर आई।

स्नेहा ने बर्फ जैसी सफेद ड्रेस पहनी थी और अपने बालों की दो लंबी चोटियां बनाई हुई थीं। वह किसी गुड़िया जैसी लग रही थी।

अंदर आते ही उसने बिस्तर पर लेटी जया को देखा। उसकी कोमल और मासूम आंखों में जया के लिए स्पष्ट तिरस्कार और घृणा थी।

लेकिन जब वह बोली, तो उसकी आवाज में शहद जैसी मिठास थी:

"जया, यह लो तुम्हारा लंच। विक्रम जी थोड़ा काम में व्यस्त थे और बाहर नहीं आ सकते थे, इसलिए मैं ही रास्ते में खाना ले आई।"

उसने टिफिन मेज पर रख दिया।

उसके बोलने का अंदाज और हाव-भाव ऐसे थे मानो वह और विक्रम एक ही परिवार का हिस्सा हैं, और जया उनके बीच कोई बाहर की घुसपैठिया हो!

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