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Chapter 2

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 2

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR

रुद्र ने एक ठंडी हँसी हँसी। भैरव, जिसने अपने परिवार की दी हुई गोली से आत्मा-शक्ति तो पा ली थी, लेकिन साधना करने के बजाय उसे रुद्र को नीचा दिखाने में मज़ा आता था। ऐसा इंसान भला क्या ही उपलब्धि हासिल करेगा?

​इस शरीर की यादों में, सिर्फ़ भैरव ही नहीं, मठ के कई और लोग भी उसे अक्सर अपमानित करते थे। महीने में कुछ बार पिटना तो जैसे आम बात हो गई थी। यहाँ तक कि मठ से मिलने वाली ‘देह-शुद्धि गोलियां’ भी हमेशा छीन ली जाती थीं।

​रुद्र ने भैरव की आँखों में देखा और धीमे स्वर में पूछा, "तुम नकारा किसे कह रहे हो?"

​भैरव चौंक गया, "अरे वाह! आज इस नकारे को गुस्सा आ रहा है? तुम मुझे क्यों घूर रहे हो? क्या फिर से मार खाने का मन है?"

​जैसे ही भैरव की नज़र रुद्र की तीखी आँखों से मिली, उसे अजीब सी बेचैनी महसूस हुई।

​रुद्र ने अपनी जगह पर सीधे खड़े होकर, शांत भाव से कहा, "सिर्फ़ तुम?"

​रुद्र का यह शांत और निडर रूप भैरव के पसीने छुड़ाने के लिए काफी था। भैरव का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

​"तुझे तो आज मैं ख़त्म कर दूँगा!"

​झुंझलाहट में, भैरव ने देह-शुद्धि स्तर के दूसरे चरण की ताकत दिखाई और रुद्र को घूंसा मारने के लिए आगे बढ़ा।

​तभी एक सुरीली आवाज़ गूंजी, "रुको!"

​सबने एक साथ ऊपर देखा। बैंगनी कपड़ों में एक लड़की आ रही थी। उसके होठों पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन उसकी तीखी नज़रें सीधे भैरव पर टिकी थीं।

​लड़की को देखते ही भैरव का चेहरा पीला पड़ गया और उसके अंदर डर की लहर दौड़ गई। डर का कारण सिर्फ़ उसके बैंगनी कपड़े नहीं थे, जो मठ के 'विशेष शिष्यों' की पहचान थे। बल्कि यह नैना थी—रुद्र के परिवार की सबसे प्रतिभाशाली लड़की, जिसकी चर्चा पूरे रायगढ़ शहर में थी!

​भैरव ने मन ही मन अपनी किस्मत को कोसा। उसने सोचा था कि नए शिष्यों के सामने रुद्र को दबाकर अपनी धाक जमाएगा, लेकिन उसे उम्मीद नहीं थी कि नैना इस वक़्त यहाँ आ जाएगी।

​भैरव ने घबराते हुए कहा, "कुछ नहीं, कुछ नहीं। मैं तो बस भाई रुद्र के साथ अभ्यास करने की बात कर रहा था।" वह जानता था कि नैना और रुद्र के बीच बहुत गहरा रिश्ता है।

​नैना ने उसे घूरा और बस एक शब्द कहा, "दफा हो जाओ!"

​भैरव का शरीर कांप गया। वह मुड़ा और जाते-जाते रुद्र को एक ज़हरीली नज़र से देखा, फिर नए शिष्यों को लेकर रुद्र के आँगन से निकल गया।

​रुद्र ने नैना की ओर देखा, "नैना! तुम यहाँ कैसे?"

​नैना के चेहरे की सख्ती पिघल गई और एक प्यारी मुस्कान तैर गई, "मैं तुमसे मिलने छुपकर आई हूँ।"

​यह मशहूर 'बर्फ जैसी सुंदरी', जो न केवल अद्भुत प्रतिभाशाली थी बल्कि बेहद खूबसूरत भी, दूसरों के सामने शायद ही कभी मुस्कुराती थी। लेकिन रुद्र, जो उसके बचपन का साथी था, उसके लिए वह हमेशा नरम दिल थी।

​नैना कभी नहीं भूल सकती थी कि जब बचपन में वह पहाड़ी से गिर गई थी और बाकी बच्चे डरकर भाग गए थे, तब सात साल के रुद्र ने ही उसका हाथ थामे रखा था, जब तक कि बड़ों ने आकर उन्हें नहीं बचाया।

​वक़्त के साथ, नैना अपनी प्रतिभा के दम पर बारह साल की उम्र में ही देह-शुद्धि के छठे स्तर पर पहुँच गई और छह-सितारा आत्मा-शक्ति जागृत करके सीधे मठ की विशेष शिष्या बन गई। अब उनका मिलना-जुलना कम हो गया था।

​"ये लो!" नैना ने अपना हाथ रुद्र की ओर बढ़ाया।

​उसकी हथेली पर एक ‘देह-शुद्धि गोली’ रखी थी, जिससे हल्की औषधीय खुशबू आ रही थी।

​रुद्र ने तुरंत मना किया, "यह बहुत कीमती है, मैं इसे नहीं ले सकता!"

​देह-शुद्धि गोली साधना करने वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। परिवार और मठ अपने होनहार शिष्यों पर ऐसी कीमती चीज़ें लुटाते थे। रुद्र को भी ये गोलियां मिलती थीं, लेकिन कमज़ोर होने के कारण वे हमेशा छीन ली जाती थीं। पिछले तीन सालों में उसने एक भी गोली नहीं खाई थी।

​उसे पता था कि नैना ने यह गोली अपने हिस्से से बचाकर उसके लिए रखी है। रुद्र का दिल भर आया, लेकिन उसने इसे लेने से इंकार कर दिया।

​नैना ने डांटते हुए कहा, "अगर मैं कह रही हूँ, तो ले लो। तुम मेरे भाई हो या नहीं?! इस गोली से तुम्हारी साधना बढ़ेगी और शायद तुम्हारी आत्मा-शक्ति भी जाग जाए!"

​रुद्र कुछ कहने ही वाला था कि तभी एक भारी आवाज़ गूंजी।

​"नैना, तुम यहाँ क्या कर रही हो?"

​सुनहरे किनारी वाले बैंगनी कपड़ों में एक आदमी आँगन में दाखिल हुआ। उसने रुद्र को देखा, माथे पर शिकन डाली और नैना से बात की।

​"गुरुजी! मैं अपने भाई से मिलने आई थी!"

​नैना ने फुर्ती से वह गोली रुद्र के हाथ में थमा दी और फिर उस आदमी के सामने सिर झुकाकर खड़ी हो गई।

​"तुम यहाँ क्यों भागी चली आईं? मेरे साथ वापस चलो!" उस आदमी ने नाराज़गी से कहा।

​"जी, गुरुजी!" नैना ने एक नज़र रुद्र पर डाली और फिर भारी मन से अपने गुरु के पीछे चल दी।

​दोनों को जाते देख, रुद्र ने हाथ में थमी गोली को देखा। उसका दिल गर्माहट से भर गया।

​जाते-जाते गुरु की आवाज़ रुद्र के कानों में पड़ी, "नैना, तुम मठ की शीर्ष दस शिष्यों में से हो। भविष्य में ऐसे नकारा लोगों से कम बात किया करो, कहीं इसका असर तुम पर न पड़ जाए..."

​"गुरुजी, मेरे भाई ने बस अभी तक अपनी शक्ति नहीं जगाई है, वो बहुत होशियार है..."

​"बस करो। मैंने देखा तुमने उसे वो गोली दी। मैं तुम्हें दूसरी दे दूँगा, लेकिन यह फिर नहीं होना चाहिए। याद रखो, पंद्रह साल की उम्र तक जिसकी आत्मा-शक्ति न जागे, वो नकारा है। उससे दूर रहना ही बेहतर है।"

​यह बातें रुद्र के कानों में तो पड़ी हीं, साथ ही बाहर छिपे भैरव ने भी सुन लीं।

​रुद्र की आँखों में एक चमक आ गई। उसने मन ही मन सोचा, "बिना ताकत के इंसान को सिर्फ़ हिकारत मिलती है। यही इस दुनिया का नियम है!"

​उसने अपनी मुट्ठी भींची और आँगन से निकलकर ‘युद्ध-कला भवन’ की ओर चल पड़ा।

​रायगढ़ के छह प्रमुख मठों में से एक, दिव्य-शक्ति मठ के पास गुप्त विधाओं का खज़ाना था, जो इस चार मंजिला युद्ध-कला भवन में रखा गया था।

​अब जब रुद्र की आत्मा-शक्ति जाग चुकी थी, उसे अपने लिए सही तकनीक और युद्ध कौशल चुनना था।

​जैसे ही रुद्र सीढ़ियों पर चढ़ने लगा, एक ठंडी आवाज़ आई।

​"जिनका देह-शुद्धि स्तर तीन तक नहीं पहुँचा है, उनका अंदर जाना मना है।"

​रुद्र रुका और पहरेदार बुजुर्ग की ओर देखकर मुस्कुराया, "मैं जानता हूँ, बाबा। मेरा स्तर देह-शुद्धि के तीसरे चरण पर पहुँच चुका है।"

​बुजुर्ग का चेहरा सख्त हो गया, "रुद्र, तुम एक नकारा हो। क्या तुम्हें नहीं पता कि बड़ों से झूठ बोलना अपराध है?"

​"यकीन नहीं तो खुद देख लीजिये!"

​रुद्र ने बिना वक़्त गंवाए अपनी प्राण-ऊर्जा को प्रवाहित किया। उसके शरीर से तीसरे स्तर की शक्ति की तरंगें निकलने लगीं।

​बुजुर्ग की आँखों में अविश्वास छा गया। "तुम... सच में! यह... यह कैसे..."

​हैरान बुजुर्ग को छोड़कर रुद्र सीधे अंदर चला गया।

​अंदर किताबों की अलमारियां सजी थीं।

​"रुद्र!"

​अचानक एक परछाई सामने आ खड़ी हुई। वह लड़का हैरानी और नफ़रत भरी नज़रों से उसे देख रहा था।

​"कुणाल!" रुद्र ने उसे पहचाना।

​कुणाल भी रुद्र के ही कुल का था, लेकिन वह मुख्य परिवार से था और रायगढ़ में रहता था। रुद्र एक शाखा परिवार से था, इसलिए कुणाल उसे नीची नज़र से देखता था। ख़ासकर जब रुद्र को 'महा-बेकार' कहा जाने लगा, तो कुणाल को लगता था कि रुद्र की वजह से उसके कुल की बदनामी हो रही है।

​कुणाल ने ताना मारा, "एक नकारा भी तीसरे स्तर पर पहुँच सकता है?"

​रुद्र ने सपाट स्वर में कहा, "मैं कैसे पहुँचा, यह तुम्हारा काम नहीं है।" और वह आगे बढ़ गया।

​उसने 'अग्नि-दृष्टि कला' नाम की किताब उठाई। 'पीला-श्रेणी, मध्यम स्तर, आग की शक्ति वालों के लिए...' उसने उसे वापस रख दिया।

​फिर उसने 'जंगली बैल कला' देखी—रक्षा के लिए बेहतरीन। फिर 'गुप्त नाग कला'—लकड़ी की शक्ति, संतुलन के लिए अच्छी।

​सोच-विचार के बाद रुद्र ने 'गुप्त नाग कला' चुन ली।

​फिर वह युद्ध कौशल वाले हिस्से में गया।

​"पत्थर-तोड़ हथेली...", "मेघ-चाल...", "नीला-सूर्य भाला..."। सब एक से बढ़कर एक थे।

​तभी उसकी नज़र एक किताब पर रुकी—"अष्ट-दिशा प्रहार"।

​"अष्ट-दिशा प्रहार, धातु-तत्व, पीला-श्रेणी, मध्यम स्तर। पूरी तरह आक्रामक, कोई रक्षा नहीं। महारत हासिल करने पर इसमें आठ परतों की आंतरिक शक्ति होती है, जो आठों दिशाओं से दुश्मन को तोड़ सकती है!"

​रुद्र की आँखें चमक उठीं, "यही चाहिए मुझे!"

​वह दोनों किताबें लेकर जैसे ही मुड़ा, कुणाल ने उसका रास्ता रोक लिया।

​"रुद्र, यह 'अष्ट-दिशा प्रहार' मेरी है। इसे नीचे रख दो!"

​रुद्र ने पूछा, "क्यों?"

​"मैंने इसे पहले देखा था। लाओ इसे!" कुणाल का लहज़ा आदेश देने वाला था।

​रुद्र हँसा, "तुम्हारी? तो फिर यह मेरे हाथ में क्यों है?"

​कुणाल की आँखों में ठंडक उतर आई, "रुद्र, अगर तुमने यह किताब नहीं रखी, तो अंजाम बुरा होगा।"

​"अंजाम? मुझे नहीं पता!" रुद्र ने लापरवाही से कहा।

​कुणाल चिल्लाया, "ठीक है! अब तो मैं तुम्हारे हाथ-पैर तोड़कर तुम्हें ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज बना दूँगा। घुटने टेक और माफ़ी मांग!"

​रुद्र की आँखों में गुस्सा झलक उठा। उसकी बर्दाश्त की हद पार हो चुकी थी।

​"तुझे तो मरना है!" कुणाल ने दहाड़ लगाई। देह-शुद्धि के चौथे स्तर की ताकत उसके शरीर से फूट पड़ी।

​"रुको!"

​पहरेदार बुजुर्ग की आवाज़ गूंजी, "युद्ध-कला भवन में लड़ने वाले को हमेशा के लिए यहाँ आने से रोक दिया जाएगा!"

​यह सुनते ही कुणाल की सारी हेकड़ी ठंडी पड़ गई। उसने तुरंत अपना आभामंडल समेटा, "बाबा, मुझे माफ़ करें। मैं नियम नहीं तोडूँगा।"

​फिर वह रुद्र की ओर मुड़ा और दांत पीसते हुए बोला, "आज तो बच गए। अगली बार जब हम मिलेंगे, मैं तुम्हारी नाभि-चक्र को फोड़ दूँगा और तुम्हें सबसे बड़ा नकारा बना दूँगा!"

​रुद्र ने शांत भाव से कहा, "क्या तुम बेवकूफ हो?"

​कुणाल गुस्से से कांपने लगा, लेकिन कुछ कर नहीं पाया। उसने बस इतना कहा, "तू इंतज़ार कर!" और पैर पटकते हुए नीचे चला गया।

​किताबें दर्ज करवाने के बाद रुद्र अपने कमरे में लौटा।

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