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Chapter 11

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 11

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR

रुद्र ने एक गहरी सांस ली और चट्टान से नीचे छलांग लगा दी। कुछ ही मीटर गिरने के बाद, उसने अपनी वज्र-प्रहार तलवार को चट्टान की दीवार में धंसा दिया। तलवार के सहारे खुद को रोकते हुए, उसने उसे फिर बाहर निकाला और थोड़ा और नीचे फिसला। ऐसा कई बार करने के बाद वह आख़िरकार उस जगह के करीब पहुँच गया जहाँ फल उगे थे।

रुद्र ने अपनी पूरी प्राण-ऊर्जा को सक्रिय किया और खुद को स्थिर किया। जैसे ही उसने हाथ बढ़ाकर उस जड़ी-बूटी को छूना चाहा, तभी एक अनहोनी घट गई।

ऊपर से एक पत्थर गिरा और सीधे रुद्र के सिर पर लगा। घबराकर रुद्र ने ऊपर देखा, तो वह नन्हा भालू किनारे पर लेटा हुआ नीचे झाँकने की कोशिश कर रहा था। अचानक उसका संतुलन बिगड़ा और वह सीधा रुद्र के ऊपर आ गिरा।

"अरे... संभलकर!"

रुद्र ने बिजली की फुर्ती से उस पूरी जड़ी-बूटी को जड़ समेत उखाड़ा और अपने सीने में दबा लिया, फिर दूसरे हाथ से गिरते हुए नन्हे भालू को थामने की कोशिश की।

नन्हा भालू धप से रुद्र की गोद में आ गिरा। उसके वजन के झटके से रुद्र की वह तलवार, जो चट्टान में धंसी थी, उखड़ गई। अब रुद्र और वह नन्हा जीव, दोनों एक साथ तेज़ी से खाई में गिरने लगे। रुद्र ने सोचा भी नहीं था कि कुत्ते के बच्चे जैसा दिखने वाला यह नन्हा भालू इतना भारी होगा।

रुद्र ने घबराहट में एक हाथ से भालू को जकड़ा और दूसरे हाथ से तलवार को बार-बार दीवार में धंसाने की कोशिश की। लेकिन उनकी गिरने की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि तलवार हर बार उखड़ जाती। हालाँकि, इससे उनके गिरने की गति थोड़ी कम ज़रूर हुई।

कानों के पास साय-साय करती हवा मौत का एहसास दिला रही थी। बार-बार रुकते और गिरते हुए रुद्र को समय का अंदाज़ा ही नहीं रहा। जब उसकी प्राण-ऊर्जा लगभग खत्म होने वाली थी, तभी उसके पैरों ने ठोस ज़मीन को छुआ।

यह उस विशाल चट्टान के बीचों-बीच निकला हुआ एक छोटा सा मंच था, जहाँ बमुश्किल एक इंसान खड़ा हो सकता था। रुद्र ने चैन की सांस ली ही थी कि उसकी नज़र पीछे की दीवार पर पड़ी। वहाँ एक गुफा का द्वार था। उसे यकीन नहीं हुआ कि इतनी ऊँचाई पर यहाँ एक गुफा भी हो सकती है।

रुद्र ने हड़बड़ी में अंदर जाने के बजाय, वहीं पालती मारकर बैठना उचित समझा। उसने नन्हे सफ़ेद भालू को ज़मीन पर बिठाया, मज़ाक में उसकी पीठ पर दो बार धप्प से हाथ मारा और अपनी जेब से वह कीमती जड़ी-बूटी निकाल ली।

डर से कांप रहा नन्हा भालू जड़ी-बूटी को देखते ही तुरंत उछल पड़ा। वह ख़ुशी से चीखने लगा और अपने पंजे हिलाते हुए रुद्र की ओर उम्मीद भरी, मासूम नज़रों से देखने लगा।

रुद्र हँस पड़ा, "तू तो सचमुच पेटू है, तुझे अपनी जान की भी परवाह नहीं! यह ले..."

उसने दो 'सौभाग्य फल' उसकी ओर उछाल दिए। नन्हे भालू ने हवा में ही उन्हें अपने पंजों में लपक लिया और बिना देखे ही अपने बड़े से मुँह में डालकर निगल गया। इसके बाद वह तुरंत पालती मारकर बैठ गया ताकि फलों की शुद्ध ऊर्जा को सोख सके।

जामुनी दिव्य भालू की यह हरकत देखकर रुद्र को कोई हैरानी नहीं हुई। जिन आध्यात्मिक जीवों में समझ विकसित हो जाती है, वे साधारण जानवरों से बहुत अलग होते हैं। वे खुद साधना कर सकते हैं, और यह तो फिर भी एक उच्च श्रेणी का दिव्य भालू था।

नन्हे भालू के चारों ओर हल्की आध्यात्मिक ऊर्जा की तरंगें उठती देख, रुद्र भी ध्यान मुद्रा में बैठ गया। उसने भी एक सौभाग्य फल खाया और उसकी ऊर्जा को सोखने के लिए 'गुप्त नाग कला' का उपयोग शुरू कर दिया।

यह सौभाग्य फल लकड़ी-तत्व की एक उच्च श्रेणी की औषधि थी। मुँह में जाते ही एक शुद्ध ऊर्जा ने रुद्र के शरीर को घेर लिया और उससे हल्की हरी रौशनी निकलने लगी।

उस हरी रौशनी के घेरे में रुद्र को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह किसी गर्म पानी के कुंड में स्नान कर रहा हो। उसका पूरा शरीर बेहद आरामदायक और तरोताज़ा हो गया, और उसके भीतर की प्राण-ऊर्जा तेज़ी से घूमने लगी।

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एक घंटे बाद...

रुद्र ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। फल की पूरी ऊर्जा उसके शरीर में समा चुकी थी। जैसे ही वह खड़ा हुआ, उसकी हड्डियों से चटकने की आवाज़ें आने लगीं।

रुद्र ने पाया कि केवल एक सौभाग्य फल ने उसे 'देह-शुद्धि स्तर' के पांचवें चरण से सीधे छठे चरण पर पहुँचा दिया था। उसकी प्राण-ऊर्जा पहले से कम से कम दोगुनी हो गई थी।

इतना ही नहीं, जब उसने अपने शरीर पर नज़र डाली, तो देखा कि उसकी त्वचा पर काली, चिपचिपी गंदगी जमी हुई थी, जिससे बदबू आ रही थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि यह फल उसके शरीर की अशुद्धियों को निकालकर उसे इतना शुद्ध कर देगा।

एक लंबी अंगड़ाई लेते हुए रुद्र ने महसूस किया कि उसकी थकान पूरी तरह मिट चुकी है और उसके भीतर शक्ति का एक नया सागर हिलोरे ले रहा है।

उसने नन्हे भालू की ओर देखा, जो अभी भी ध्यान में बैठा था। रुद्र ने उसे छेड़ना ठीक नहीं समझा और गुफा के अंदरूनी हिस्से की ओर बढ़ गया।

गुफा में कदम रखते ही उसे भीतर से आती हुई एक सर्द हवा महसूस हुई, जो हड्डियों को जमा देने वाली ठंडक का अहसास करा रही थी।

अपनी प्राण-ऊर्जा का कवच बनाकर वह आगे बढ़ा। गुफा अंदर से साफ़-सुथरी थी और वहां सीलन बिल्कुल नहीं थी। कुछ ही दूर चलने पर वह एक विशाल पत्थर के कक्ष में पहुँचा।

इस कक्ष में पत्थर की मेज़ और कुर्सियाँ थीं, जिससे लग रहा था कि यहाँ कभी कोई रहता था। कक्ष के चारों ओर चार कमरे बने हुए थे। रुद्र पहले कमरे की ओर बढ़ा।

पहला कमरा पूरी तरह खाली था, वहां एक कंकड़ तक नहीं था। दूसरे और तीसरे कमरे का भी वही हाल था, जिसे देखकर रुद्र सन्न रह गया।

"क्या सब खाली हैं...?" रुद्र के स्वर में भारी निराशा थी।

चौथे कमरे के दरवाज़े पर पहुँचकर जब उसने अंदर झाँका, तो देखा कि वहां केवल एक पत्थर का बिस्तर था। पास ही एक मेज़ पर एक पुरानी किताब रखी थी, जिसे एक अजीब धातु के टोकन से दबाया गया था।

रुद्र की नज़रे उस किताब पर जम गईं। उसने उसे धीरे से उठाया। उस पर बड़े और प्रभावशाली अक्षरों में लिखा था: "राक्षस अनंत कला"।

अचानक, उस किताब से एक भयानक शक्ति निकली। रुद्र का दिमाग सुन्न हो गया, आँखों के आगे अँधेरा छा गया और उसे अपने सामने हड्डियों का एक अनंत समुद्र और लाशों के पहाड़ दिखाई देने लगे। जहाँ तक नज़र जाती, बस सफ़ेद हड्डियाँ ही हड्डियाँ थीं।

रुद्र बुरी तरह घबरा गया। उसने अपने पैरों की ओर देखा और तभी एक ज़ोरदार गड़गड़ाहट के साथ हड्डियों का ढेर हिलने लगा। पास ही हड्डियों के एक पहाड़ से एक विशालकाय आकृति उठी, जिसके हाथ में सोने का त्रिशूल था। वह पूरी ताकत से रुद्र की ओर झपटा।

तभी दृश्य बदला, रौशनी और अँधेरे का खेल चला, और रुद्र वापस उसी गुफा में खड़ा था। उसके हाथ में वही किताब थी, लेकिन वह पसीने से तर-बतर था।

राक्षस अस्थि सागर!

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उसने जो देखा था, उसने उसकी रूह कंपा दी थी।

माथे से पसीना पोंछते हुए उसने अपने हाथ में थमी "राक्षस अनंत कला" को देखा। एक गहरी साँस लेकर उसने खुद को शांत किया और किताब का पहला पन्ना पलटा।

"पाताल और आकाश का मिलन, राक्षस अनंत..."

हर शब्द में जैसे कोई प्राचीन शक्ति थी जो रुद्र के दिमाग में विस्फोट कर रही थी। भूत-प्रेतों की चीखें और डरावनी आवाज़ें गूँजने लगीं। हवा में फिर से वही त्रिशूल धारी राक्षस प्रकट हुआ, जिससे एक भयानक दबाव निकल रहा था। रुद्र की आँखें फटी रह गईं, उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था।

तभी, उसके पीछे उसकी 'श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति' प्रकट हुई। उसने हज़ारों सुनहरी किरणें बिखेरते हुए उस राक्षस पर एक ज़ोरदार दहाड़ लगाई। वह मायावी राक्षस तुरंत धुएं की तरह गायब हो गया।

जैसे ही श्वेत-बाघ वापस उसके शरीर में समाया, रुद्र झटके से होश में आया।

जब उसने दोबारा किताब की ओर देखा, तो वे डरावनी पंक्तियाँ गायब हो चुकी थीं और उनकी जगह नई इबारत लिखी थी।

"जो मेरी 'राक्षस अनंत कला' को साधेगा, वह आकाश और धरती को निगल जाएगा, अनंत काल तक युद्ध करेगा... और अमर हो जाएगा!"

रुद्र पन्ने पलटता गया। हर पन्ने के शब्द सुनहरी रौशनी बनकर सीधे उसके माथे में समाते चले गए। साधना की एक नई विधि उसके दिमाग में छप गई।

हैरानी की बात यह थी कि इस तकनीक का कोई स्तर नहीं लिखा था। रुद्र पालती मारकर बैठ गया और विधि के अनुसार पहले चरण का अभ्यास करने लगा। जैसे ही उसने अपनी प्राण-ऊर्जा घुमाई, पीछे से श्वेत-बाघ फिर उभरा और सुनहरी रौशनी ने रुद्र को घेर लिया।

राक्षस की वह खूनी ऊर्जा पूरी तरह दब गई और रुद्र पर उसका कोई बुरा असर नहीं पड़ा।

"राक्षस शरीर को तपाओ, राक्षस मार्ग पर चलो, तुम मेरे निजी शिष्य बनोगे। मेरा नाम 'कालनाथ' है। यह राक्षस-टोकन लो और 'राक्षस संप्रदाय' पर राज करो।"

साधना का एक चक्र पूरा होते ही रुद्र के दिमाग में यह संदेश गूँजा।

यह किताब राक्षस संप्रदाय के 'कालनाथ' ने छोड़ी थी। यह जानकर रुद्र के खून में उबाल आ गया।

"राक्षस टोकन!"

उसने पास पड़े उस छोटे से टोकन को उठाया। रुद्र के भीतर मौजूद राक्षस प्राण-ऊर्जा के संपर्क में आते ही वह टोकन चमका और पिघलकर रुद्र की हथेली में एक निशान बनकर समा गया।

"अरे! यह तो एक जादुई भंडारण (Storage Space) है!" रुद्र की ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

जादुई भंडारण बहुत कीमती होते थे। अवध राज्य में, जहाँ रुद्र का परिवार रहता था, केवल राजा के पास ही ऐसी चीज़ थी। यहाँ तक कि उसके कबीले के मुखिया के पास भी यह नहीं था। और यह तो अंगूठी या बेल्ट नहीं, बल्कि हथेली में बना एक निशान था, जिसे कोई चुरा भी नहीं सकता था।

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