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Chapter 15

N - Chapter 15

Superme Dragon Yoddha

अविनाश और अनवी के अलग होने के कुछ ही देर बाद, एक बुज़ुर्ग व्यक्ति मंच से आगे आए। वे राजपूत परिवार के दूसरे बुज़ुर्ग थे, जो मासिक परीक्षा का संचालन कर रहे थे।

उनकी नज़र नीचे खड़ी भीड़ पर घूमी और उन्होंने कहा,

“तुम सब मासिक परीक्षा के महत्व को जानते हो। मुझे ज़्यादा कहने की ज़रूरत नहीं!”

“अब नियम सुन लो।” “यह मासिक परीक्षा तीन चरणों में होगी!”

“पहला चरण—100 लोगों की एलिमिनेशन प्रतियोगिता!” “बाहरी निवास के हर सदस्य को एक नंबर प्लेट दी जाएगी। जिन दो नंबरों को पुकारा जाएगा, वे आमने-सामने लड़ेंगे। अंतिम 100 लोग अगले चरण के लिए अयोग्य होंगे।”

इसके बाद सेवकों ने सभी को नंबर प्लेट बाँट दी।

अविनाश को जो मिली, उस पर 68 लिखा था।

“अब मैं घोषणा करता हूँ—नंबर 7, साहिल

बनाम नंबर 85, राहुल दूसरे बुज़ुर्ग ने मुकाबले की घोषणा की।

तुरंत ही दो सजीले व्यक्तित्व मंच पर जा उतरे।

मंच के नीचे तालियों और जयकारों की गूँज उठी—और साफ़ था कि राहुल को कहीं ज़्यादा समर्थन मिल रहा था। आखिर वह राजपूत परिवार की मशहूर सुंदरियों में से एक थी।

अविनाश शांति से यह सब देखता रहा, मानो उसका इससे कोई लेना-देना ही न हो।

“पहले एलिमिनेशन राउंड में— नंबर 85, राहुल विजेता!”

परिणाम सुनते ही राहुल खुशी से चमक उठी। चारों ओर से आती तालियों ने उसके अहंकार को और बढ़ा दिया।

लेकिन जब उसकी नज़र अविनाश के उदासीन चेहरे पर पड़ी, तो उसने दाँत पीस लिए।

“कचरे, देखते हैं तू कब तक अकड़ दिखाता है!”

यह कहकर वह मंच से कूदकर नीचे उतर गई।

इसके बाद एक के बाद एक मुकाबले होते रहे।

आख़िरकार, जब एक आवाज़ गूँजी, तो राहुल का चेहरा तुरंत खिल उठा और उसकी नज़र अविनाश पर तंज़ से टिक गई।

“अगला मुकाबला— नंबर 68, अविनाश बनाम

नंबर 15, कौरव !”

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दूसरे बुज़ुर्ग के बोलते ही अचानक एक आदमी मंच पर कूद पड़ा। वह गठीला शरीर, गंभीर नज़र और घमंडी चेहरे वाला था।

उसका नाम कौरव था, और बाहरी प्रांगण के शिष्यों में वह काफ़ी मशहूर था।

पिछले एक महीने से वह बाहर रहकर कड़ी साधना कर रहा था, ताकि इस प्रतियोगिता में टॉप दस में जगह बना सके।

उसकी साधना पहले ही मेरिडियन ओपनिंग रियल्म के छठे स्तर तक पहुँच चुकी थी, इसलिए उसका आत्मविश्वास आसमान छू रहा था। जब उसने सामने धीरे-धीरे मंच पर चढ़ते दुबले-पतले युवक को देखा, तो उसकी आँखों में साफ़ तिरस्कार झलकने लगा।

वह सामने खड़े व्यक्ति को पहचान गया—यह वही अविनाश था, जो बाहरी प्रांगण में एक समय बदनाम निकम्मा माना जाता था। कहा जाता था कि एक महीने पहले जब वह यहाँ से गया था, तब वह मेरिडियन ओपनिंग रियल्म के पहले स्तर तक भी नहीं पहुँचा था।

इसी पल उसके दिमाग़ में एक नाम उभरा—नीरज , जो बाहरी प्रांगण में सातवें स्थान पर था। वही उसका लक्ष्य था, जिसे वह हर हाल में हराना चाहता था।

और सामने खड़ा यह अविनाश … हूँ! इसे हराना तो बस एक थप्पड़ मारने जैसा होगा।

लेकिन मंच के नीचे मौजूद वे राजपूत परिवार के सदस्य, जो अविनाश की हालिया हैरान करने वाली उपलब्धियों के बारे में जानते थे, अजीब नज़रों से यह दृश्य देख रहे थे।

लगता था कि इस बार कौरव बुरी तरह फँसने वाला है।

मार्शल आर्ट्स के मंच पर—

कौरव को नीचे की भीड़ की प्रतिक्रिया का कोई अंदाज़ा नहीं था। उसने बाज़ू बाँधे, अविनाश को उपहास भरी नज़र से देखा और ठंडे स्वर में बोला—

“लड़के, मैं तुम्हें दो विकल्प देता हूँ। पहला—खुद अपने दोनों हाथ काट लो और यहाँ से उतर जाओ।

दूसरा—मैं तुम्हें अपाहिज बनाकर मंच से नीचे फेंक दूँ।”

लेकिन उसकी बातों का अविनाश पर कोई असर नहीं हुआ। उसकी आँखों में केवल उदासीनता थी, मानो वह किसी मूर्ख को देख रहा हो।

“कमबख़्त, तू मौत को दावत दे रहा है!”

अविनाश की नज़र देखकर कौरव भड़क उठा। उसने समझा था कि वह उसे पहले ही काफ़ी इज़्ज़त दे चुका है, लेकिन जब सामने वाला समझ ही नहीं रहा, तो उसे सबक़ सिखाना ही पड़ेगा।

यह कहते ही उसने ज़मीन पर ज़ोर से पैर पटका और धमाके के साथ आगे बढ़ते हुए अविनाश के कंधे पर सीधा मुक्का मार दिया।

कौरव के सीधे हमले को देखकर भी अविनाश के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। उसने भी मुट्ठी बाँधी।और उसी पल उसकी मुट्ठी के साथ एक ड्रैगन के आकार की छाया उभरी।

“हाहा! गिर जा, लड़के!”

कौरव खुशी से चिल्लाया। उसे लगा कि जीत अब उसकी मुट्ठी में है और टॉप टेन का सपना सच होने वाला है।

लेकिन…अगले ही पल—“कड़क!” “आह!”

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जैसे ही दोनों की मुट्ठियाँ टकराईं, कौरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसके चेहरे पर आई मुस्कान वहीं जम गई। उसे समझने का मौका भी नहीं मिला कि हुआ क्या—और वह कूड़े की तरह उड़ता हुआ सीधे मंच से बाहर जा गिरा, वहीं बेहोश हो गया।

“यह…!”

मैदान में हुआ यह पलटाव देखकर राजपूत परिवार के सभी बड़े लोग तुरंत खड़े हो गए। उनकी आँखों में गहरा सदमा था।

“यह युवक कौन है? इसने बाहरी प्रांगण में ग्यारहवें स्थान पर रहने वाले कौरव को एक ही मुक्के में उड़ा दिया!”

यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि खुद राघव , राजपूत परिवार के मुखिया ने कही।

यह सुनकर दूसरे बुज़ुर्ग ने तुरंत उत्तर दिया,

“कुलपति, यह हमारे राजपूत परिवार की शाखा का शिष्य है ,नाम है अविनाश ।”

“कहा जाता है कि एक महीने पहले वह मेरिडियन ओपनिंग रियल्म के पहले स्तर तक भी नहीं पहुँचा था, लेकिन किसी कारण से उसकी साधना ने एक ही महीने में ज़बरदस्त छलांग लगाई है। इस साल वह बाहरी शाखा का सबसे बड़ा ‘डार्क हॉर्स’ माना जा सकता है।”

“ओह!”

यह सुनकर राघव की आँखों में रुचि की चमक आ गई।

कौरव को हराने के बाद अविनाश मंच से उतरकर अपनी जगह वापस चला गया।

इसके बाद भी एक के बाद एक मुकाबले होते रहे।

लेकिन अविनाश ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वह वहीं पालथी मारकर बैठ गया और साधना में लीन हो गया। अगर उसे पहला स्थान पक्का करना था, तो उसे मेरिडियन ओपनिंग रियल्म के नौवें स्तर तक पहुँचना ही होगा।

समय तेज़ी से बीता, और आधा दिन निकल गया।

इसी बीच, अविनाश ने फिर अपना नाम सुना— “अगला मुकाबला—नंबर 68, अविनाश बनाम नंबर 24, सत्या !”

अविनाश फिर से मंच पर चढ़ा। उसके सामने एक दुबला-पतला आदमी भी आगे आया। “हेहे! अविनाश , मैं उस बेकार कौरव जैसा नहीं हूँ, मैं—”

“धड़ाम!” “आह!”

लेकिन वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया, और ज़बरदस्त ताक़त से भरा एक मुक्का सीधे उसकी छाती पर आ लगा।

चीख के साथ सबने देखा कि एक शरीर मंच से बाहर उड़कर गिरा और ज़मीन पर मछली की तरह तड़पने लगा।

उस पल, सबकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। अविनाश ने ज़मीन पर पड़े सत्या को उदासीन नज़र से देखा।

“कोई फ़र्क़ है?” पूरा मैदान खामोश हो गया।

यह सत्या था—बाहरी प्रांगण की रैंकिंग में नौवें स्थान पर—और फिर भी अविनाश के सामने वह बिल्कुल बेबस था।

इसके बाद अविनाश ने कई और शिष्यों को चुनौती दी, लेकिन नतीजा एक ही रहा।

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