A cruel fairytale - Chapter 2
A Cruel Fairytaleसुबह के लगभग 7 बज रहे थे। कोलकाता की एक पुश्तैनी हवेली के अंदर सुबह-सुबह पूजा की घंटियां बज रही थी। एक लगभग 45 साल के करीब दुबली पतली औरत, जिसने अपने बालों को तौलिए से बांध रखा था, उसके हाथ में पूजा की थाली थी। उसने साड़ी पहन रखी थी और पूजा करने के बाद भगवान के सामने हाथ जोड़े।
हाथ जोड़ते हुए वो औरत बोली, “देवी मां मेरी आरू को खूब-खूब तरक्की देना और वो दिल लगाकर पढ़ाई पूरी कर रही है तो इस बार कोई अड़चन मत आने देना।” वो आरोही की मां संध्या थी।
पूजा करने के बाद संध्या ने आंगन से ही आरोही को आवाज़ लगाई, “आरू... आरोही... बेटा आरू, कितनी देर तक सोएगी। पता है ना कॉलेज जाना है और अब तक बिस्तर में पड़ी है। कल की तरह फिर से देर हो गई तो आकर हमें ही दो बातें सुनाएगी।”
आरोही अपने बेड पर आराम से सोई हुई थी। संध्या की आवाज सुनकर उसकी नींद टूटी। आरोही को ऐसे लग रहा था जैसे वो किसी सपने से बाहर आई हो। उसने चारों तरफ नजरे घूमा कर अपने कमरे को देखा। वो अपने पुश्तैनी घर में थी, जो कोलकाता में था।
आरोही खुद को उस कमरे में पाकर चौंक गई। वो अपने सिर पर हाथ लगाकर पुरानी बातें सोचने की कोशिश करने लगी। उसने धीरे से कहा, “मैं यहां कैसे आ सकती हूं? मैं तो बचपन में यहां रहती थी। मुझे ऐसे क्यों लगा जैसे मां ने मुझे आवाज दी हो। ऐसा कैसे हो सकता है। वो तो इस दुनिया में ही नहीं है और मैं यहां कैसे आई? मैं तो प्रेस कॉन्फ्रेंस से बाहर निकली थी और मेरा एक्सीडेंट हो गया था।” आरोही के साथ जो भी हुआ था, वो उसे याद था।
आरोही उलझन में बिस्तर पर ही थी कि तभी उसे झटका सा लगा। सामने दरवाजे पर उसकी मां खड़ी थी, जिसके हाथ में चाय का कप था। संध्या को अपने सामने देखकर आरोही को घबरा गई। वो डर कर पीछे खिसकने लगी। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था।
“म... मां... आप... कैसे।” आरोही उन्हें देखते हुए अटकते हुए बोलने की कोशिश कर रही थी।
संध्या ने उसे देखकर सिर हिलाया और चाय की ट्रे बेड साइड पर रखते हुए बोली, “तुम्हारा चेहरा सफेद क्यों हो गया, जैसे कोई भूत देख लिया हो? जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हारी फ्रेंड काजल आती ही होगी।” संध्या ने उसे प्यार से डांटा।
“लेकिन मेरी तो कोई फ्रेंड नहीं है। आप किसकी बात कर रही है।” आरोही ने हैरानी से पूछा।
संध्या ने उसके माथे पर हाथ रखा और कहा, “बुखार तो नही है, फिर ये बहकी बहकी बातें क्यों कर रही है? देख तेरे पापा को बैंक जाने में देर हो रही है। उनके लिए डिब्बा तैयार करना है।” कहकर संध्या वहां से चली गई।
संध्या की बातें आरोही को हैरानी में डाल रही थी। वो धीरे से बोली, “काजल कौन हो सकती है? और मुझे ये नाम सुना हुआ क्यों लग रहा है? पापा बैंक क्यों जायेगे? वो तो स्कूल में प्रिंसिपल है। बाकी सब बाद में, मेरा एक्सीडेंट हुआ था, मैं यहां क्या कर रही हूं?”
आरोही को हर एक चीज सकते में डाल रही थी। वो उठकर ड्रेसिंग टेबल के सामने गई और खुद को देखा। वो हमेशा से अलग लग रही थी।
आरोही को इंडियन पहनना कम पसंद था। उसने इंटरव्यू के लिए खास ड्रेस मंगवाई थी, ताकि पब्लिक में अपनी इमेज सही कर सके। उसने अपने कपड़ो को देखा तो इस वक्त उसने सफेद रंग का स्लीवलेस कुर्ती और नीचे सफेद ही प्लाजो पेंट पहना था। उसके बाल हल्के वेवी थे, लेकिन अब बिल्कुल स्ट्रेट लग रहे थे। ऐसी ड्रेस आरोही के पास थी तो नही लेकिन उसने इस ड्रेस को पहले भी कही देखा था।
आरोही ने फिर कमरे में नजरें दौड़ाई। कमरे में डस्की स्काई ब्लू पैंट था। इंटीरियर भी उसकी हवेली से अलग था। हवेली पुरानी जमाने की थी तो उसका फर्नीचर भी उसके हिसाब था लेकिन इस कमरे का फर्नीचर थोड़ा मॉडर्न था।
आरोही को ऐसे लग रहा था जैसे वो अचानक ही वो किसी अलग ही दुनिया में पहुंच गई हो। एक जानी पहचानी दुनिया, लेकिन फिर भी सब अनजान।
आरोही वहां अपने ख्यालों में खोई थी तभी उसे बाहर किसी लडकी की तेज आवाज सुनाई दी। आरोही दौड़कर बाहर गई तो एक लगभग 22 साल की लड़की खड़ी थी। हल्का गेरुआ रंग, तीखे नैन नक्श, जिसने घुटनों तक का रेड फ्रॉक पहना था। वो काजल थी।
काजल ने कुछ देर नीचे संध्या से बात की और फिर मुस्कुराते हुए ऊपर आई। ऊपर आते ही उसने आरोही को तैयार हुए बिना देखा तो वो अपने दोनों कमर पर हाथ रख कर बोली, “आंटी बिल्कुल ठीक कह रही थी। तुम अब तक तैयार नहीं हुई हो। अब तुम्हारा वो डायलॉग कहां गया, जब तुम कहती थी कि दुनिया इधर-उधर हो जाए लेकिन तुम अपने फेवरेट दत्त सर का लेक्चर कभी मिस नहीं करोगी। भूल गई क्या , एथिक्स तेरा फेवरेट सब्जेक्ट है। हमेशा तो तू इतनी एक्साइटेड रहती है और आज तैयार भी नहीं हुई।”
जैसे-जैसे काजल बोले जा रही थी उसके शब्द आरोही के कानों में गूंज रहे थे। वो अपने कान पर हाथ रखकर जोर से चिल्लाई।
आरोही दौड़कर बाथरूम में चली गई। कमरे से अटैच बाथरूम था। अचानक उसे याद आया कि हवेली में किसी भी कमरे में अटैच बाथरूम नहीं था। फिर इस कमरे में कैसे हो सकता है? फिर उसने इधर-उधर नज़रें दौड़ाई तो बाथरूम बिल्कुल वैसा ही था जैसे उसने अपनी किताब में लिखा था। वही किताब जिसके चलते उसे दुनिया से रूबरू होना पड़ा था। धीरे-धीरे आरोही को सब याद आ रहा था। वो अपनी ही बनाई दुनिया में फंस चुकी थी... अपनी किताब की दुनिया में।
आरोही को याद आया कि उसने अपने नॉवेल की शुरुआत भी इसी तरह की थी, जब सुबह उसकी मां ने उसे जगाया था और उसकी फ्रेंड काजल उसके देर से उठने पर उसे डांट रही थी क्योंकि आज पहली बार आरोही देर से उठी थी। हमेशा वो कॉलेज का फर्स्ट लेक्चर, जो मिस्टर दत्त का होता था उसे कभी मिस नहीं करती थी लेकिन आज उनकी वजह से उन्हें देर हो गई थी। आरोही सब कुछ समझने की कोशिश कर रही थी तभी काजल ने जोर-जोर से दरवाजा खटखटाया। इसी के साथ आरोही का ध्यान टूटा। काजल बाहर से उसे आवाज लग रही थी।
सच्चाई का अहसास होते ही आरोही अपने कानों पर हाथ रख कर बोली, “नहीं, ये नहीं हो सकता... मेरा तो एक्सीडेंट हुआ था फिर मैं इस दुनिया में कैसे आ सकती हूं? मैं अपनी नॉवेल की दुनिया में नहीं फंस सकती। ये कोई फेयरी टेल नहीं है और ना ही कोई जादुई दुनिया, जो मैं यहां आ गई। सब कुछ नॉवेल के हिसाब से नहीं हो सकता। अगर सब कुछ उस हिसाब से हुआ तो मैं... नहीं, ये नहीं हो सकता। ये हुआ तो मुझे मरना होगा और वो सब झेलना होगा, जो मैंने अपनी कहानी में लिखा था।”
आरोही की आंखों में उसके नॉवेल के शब्द दृश्य की तरह घूमने लगे कि किस तरह उसे रिदांश ठाकुर ने किडनैप किया था और उसके बाद उसके साथ क्या कुछ नहीं हुआ था।
अचानक आरोही के मुंह से निकला, “रिदांश ठाकुर... अगर सब कुछ नॉवेल के हिसाब से हो रहा है तो मुझे आज कॉलेज नहीं जाना। नॉवेल में आरोही की मुलाकात रिदांश ठाकुर से कॉलेज जाते वक्त ही हुई थी, जब वो देर हो गई थी और उसने रिदांश को किसी को मारते हुए देख लिया था। “मैं...मैं अपने नॉवेल की स्टोरी जानती हूं तो इसे बदल कर रहूंगी। अरे वो कहानी थी, हकीकत कैसे बन सकती है। हकीकत में कोई इतना सब कुछ कैसे झेल सकता है।”
अब आरोही को एहसास हो गया था कि सब उसके नॉवेल के खिलाफ क्यों गए थे। उसने वाकई कुछ चीजे बहुत बुरी लिखी थी जिसमे था, रिदांश का आरोही को बुरी तरह टॉर्चर करना। खुद के साथ वो सब होने के एहसास से ही आरोही घबरा गई और खुद को बाथरूम में बंद कर लिया। वो नॉवेल की कहानी जानती थी इसलिए उसे बदलने के लिए आरोही ने घर पर ही रहने का निश्चय किया।
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