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Chapter 14

The Replaced bride - Chapter 14

The Replaced bride

ध्रुव और ग्रीष्मा की शादी की हल्दी की रस्म पूरी हो चुकी थी। रस्म के बाद सभी लोग फ़ोटोशूट करवा रहे थे। उन सब को एक साथ खुश देखकर तारा अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचकर भावुक हो गई।

“तारा…,” ग्रीष्मा ने आवाज़ लगाई। “तुम भी आओ ना हमारे साथ…”

तारा ने सबकी नज़रों से छुपकर अपने आँसू पोछे और मुस्कुराते हुए उनकी तरफ़ बढ़ी। उसने भी उन लोगों के साथ में फ़ोटो क्लिक करवाईं।

“क्या हुआ? तुम परेशान क्यों हो?” तारा को उदास देखकर ग्रीष्मा ने पूछा।

“अरे कुछ नहीं, मैं जब भी किसी की शादी होते देखती हूँ, तो थोड़ा इमोशनल हो जाती हूँ।”

“तुम दूसरों की शादी देखकर इतनी इमोशनल हो जाती हो, तो जब खुद की शादी होगी तब क्या करोगी?” ग्रीष्मा ने हल्का हँसते हुए कहा।

“पता नहीं… मेरी ज़िंदगी में वो वक़्त आएगा भी या नहीं…” तारा ने अपने मन में सोचा।

तारा सबके बीच रहकर अपने ग़मों को छिपाने की कोशिश कर रही थी। उसका मन भारी हो रहा था और रोने का मन कर रहा था, तो वो बहाना बनाकर वहाँ से ऊपर चली गई।

तारा की आँखों में आँसू थे, जिसे वो चाहकर भी नहीं रोक पा रही थी।

“आपने क्या मेरे लिए स्पेशल टाइम निकालकर मेरी किस्मत लिखी थी?” तारा ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखकर कहा। “सब को सब कुछ मिलता है। सब कुछ ना मिले, लेकिन… लेकिन फ़ैमिली सब के पास मौजूद होती है। मम्मा ना हो, तो पापा होते हैं। पापा ना हो तो माँ, भाई या बहन, दादा या दादी, कोई ना कोई तो होता है सबके पास… लेकिन हम… हमारे पास कहने के लिए कोई भी अपना नहीं है।”

तारा आसमान में देखकर भगवान से शिकायत कर रही थी। तभी उसके फ़ोन पर किसी का कॉल आया। उसने जल्दी से अपने आँसू पोछे और खुद को सामान्य किया।

“चलो शुक्र है, तुम्हें मेरी याद तो आई।” तारा ने हँसने का दिखावा किया।

“हाँ बोल तो ऐसे रही है जैसे जाने के बाद तूने मुझे 50 कॉल कर दिए हों। शिकायतें बाद में कर लेना, अच्छा पहले बता, क्यों रो रही थी?” सामने से एक लड़की की आवाज़ आई।

उसके प्यार भरे शब्द सुनकर तारा के मुँह से सिसकी निकली। अब तक वो अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी, अगले ही पल उसके आँसू उसकी आँखों की कैद से बाहर थे। उसने भारी आवाज़ में जवाब दिया, “कुछ नहीं तनीषा, हर बार की तरह उस ऊपर वाले से वही सवाल पूछ रही थी।”

“तू ना पागल है… लोगों के तो गिने-चुने एक या दो भाई-बहन होते हैं, सोच हमारे आश्रम में तो हमारे कितने सारे भाई-बहन हैं। समीधा आंटी बिल्कुल हमारी माँ की तरह हमें प्यार करती हैं। रामधन काका और शिवा भैया को कैसे भूल सकती हो तुम? वो सिर्फ़ आश्रम की ही नहीं, हम सब की भी अच्छे से चौकीदारी करते हैं। उनके होते हुए तुम्हें अपनों की कमी खल भी कैसे सकती है?”

“हाँ सही कह रही है तू, मैं भी पागल हूँ, जो उन लोगों को याद कर रो रही हूँ, जिन्होंने पैदा होने के एक दिन तक भी मुझे अपने पास नहीं रखा और वही हॉस्पिटल में छोड़कर चले गए।” तारा ने सख़्त आवाज़ में जवाब दिया।

“ये हुई ना बात… शुक्र है हम उनके साथ नहीं रहते, जो अपने ही बच्चों को छोड़कर भगोड़ों की तरह भाग जाते हैं। हम उन लोगों के साथ रहते हैं, जो हज़ारों अनाथों को अपना बच्चा समझकर पालते हैं।”

तनीषा की बातों ने तारा को बहुत हिम्मत दी। तनीषा और वो बचपन से अहमदाबाद के एक अनाथ आश्रम में साथ पली-बढ़ी थीं। उन दोनों के वहाँ पर और भी दोस्त थे, लेकिन तनीषा और तारा दोनों सगी बहनों से भी बढ़कर एक-दूसरे से प्यार करती थीं।

“चल अब इन सब बकवास को छोड़ते हैं। अच्छा बता तुमने क्यों कॉल किया था?” तारा ने पूछा।

“तेरी उस मिस मेहता ने कॉल करके मुझे बुलाया था। उसने तुझे जॉब से निकाल दिया और तूने मुझे बताया तक नहीं? जब तुम उसके लिए काम ही नहीं कर रही तो फिर राजस्थान में कर क्या रही हो?”

“बहुत लंबी कहानी है यार…” तारा ने गहरी साँस ले कर छोड़ी।

“तो शॉर्ट में सुना दे।”

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“मुझे नौकरी से मिस मेहता ने नहीं निकाला था, बल्कि मैं जहाँ काम करने आई थी, उसने मुझे काम से निकलवाया था। सोचा था यहाँ से वापस अहमदाबाद आ जाऊँगी, लेकिन उस लड़के की होने वाली पत्नी बहुत अच्छी है। उसने मुझे काम पर रख लिया। पहले तो इनकी शादी 15 दिन बाद होने वाली थी। अब तीन-चार दिनों में निपट जाएगी तो अहमदाबाद भी आ जाऊँगी।” तारा ने एक साँस में उसे पूरी कहानी सुना दी।

“ठीक है मुझे इंतज़ार रहेगा। सुन, आते वक़्त मेरे लिए राजस्थान के दुपट्टे और दाल-बाटी-चूरमा लेकर आना मत भूलना।” तनीषा ने कहा।

“दाल-बाटी-चूरमा लेकर नहीं आऊँगी, बल्कि उसकी रेसिपी सीखकर आ जाऊँगी, ताकि तुम सबको बनाकर खिला सकूँ। रही बात राजस्थान के दुपट्टे लाने की, जिस दिन तू दुपट्टा लगाना शुरू कर देगी, उस दिन दुपट्टे भी लाकर दे दूँगी। चल अब रखती हूँ, बहुत काम है।”

तनीषा ने हामी भरी और कॉल कट कर दिया। उससे बात करके तारा का मूड काफ़ी अच्छा हो गया था। वो रोते हुए ऊपर आई थी, लेकिन अब वो मुस्कुराते हुए बिना किसी शिकायत के नीचे जा रही थी।

____________

तारा नीचे पहुँची, तब ध्रुव और ग्रीष्मा के ननिहाल साइड से कुछ रिश्तेदार आए हुए थे। सब ग्रीष्मा को घेरकर बैठे थे।

“आ छोरी कौन है?” उनमें से एक औरत ने पूछा।

“मामी, वो मेरी असिस्टेंट है। शादी में मेरी हेल्प करने के लिए आई है।” ग्रीष्मा ने जवाब दिया।

“मुझे तो लगा तेरी दोस्त है। पर ये तो तेरा काम करने के लिए आई है।” उस औरत ने तारा की तरफ़ देखकर मुँह बनाया।

“मेरी दोस्त ही है मामी।” ग्रीष्मा ने कहा।

उसकी बात सुनकर उस औरत का मुँह बन गया। वो तारा को अजीब नज़रों से घूर रही थी।

“ये आंटी मुझे ऐसे घूरकर क्यों देख रही है, जैसे अगले ही पल खा जाएगी?” तारा ने साक्षी से फुसफुसाकर पूछा।

“तारा दीदी, वो हमारी मामी है। वो सिर्फ़ अपने इक्वल स्टेटस वालों को ही प्यार से देखती हैं। उसके अलावा सबको ऐसे ही आँखें फाड़कर घूरकर देखती रहती हैं।” साहित्य ने जवाब में कहा।

तारा साक्षी और साहित्य के पास खड़ी थी। “तब तो इन्हें सबक़ सिखाना पड़ेगा।” तारा ने मामी की तरफ़ घूरकर देखा।

“इस काम में तो डेफ़िनेटली हम आपके साथ हैं पार्टनर।” साक्षी और साहित्य एक साथ बोले।

“ग्रीष्मा का तो समझ में आता है, लेकिन मामी? उनके ख़िलाफ़ तुम दोनों मेरा साथ क्यों दोगे?”

“इसलिए तारा दीदी क्योंकि हमारा एक-एक रिश्तेदार हमारे लिए दुश्मन बराबर है। कोई ये नहीं कहता कि इन दोनों को आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट करो। इन्हें तो हमेशा मेरी शादी की लगी रहती है।” साक्षी ने जवाब दिया।

“हाँ और मैं भी फ़ैमिली बिज़नेस ज्वाइन नहीं करना चाहता। इनका बस चलता तो पैदा होते ही मुझे ऑफ़िस में बिठा देते। मुझे ज्वेलरी डिज़ाइनर नहीं बनना, मैं एक फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहता हूँ।” साहित्य ने कहा।

“और मैं इस वर्ल्ड को एक्सप्लोर करना चाहती हूँ। मैं दुनिया के हर एक कोने में जाकर वहाँ के कल्चर को देखना और उसे सीखना चाहती हूँ।”

साक्षी और साहित्य ने बारी-बारी से अपने सपने बता दिए, जिसे सुनकर तारा के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

“कभी दुनिया की नहीं सुनना और वही करना जो तुम्हारे दिल में है। जब कुछ बन जाओगे, तब यही दुनिया तुम्हारे पीछे-पीछे घूमेगी।”

तारा की बात सुनकर साक्षी ने कहा, “बस यही वजह है तारा दीदी कि हम आपको इतना पसंद करते हैं।”

“आप हमारी हीरो हो… आप किसी से नहीं डरती। ध्रुव भैया से भी कुछ भी कह देती हैं।” साहित्य ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई।

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“हाँ क्योंकि मैंने कभी डरना नहीं सीखा। कभी डर के कदम पीछे भी लिए हैं या अकेले भी महसूस किया है, तो मेरी फ़्रेंड तनु ने मुझे पीछे से धक्का देकर आगे किया है।”

वो तीनों आपस में बात कर रहे थे, तभी रत्ना जी वहाँ पर आईं।

“तारा, तुम मेरे साथ चलो। मुझे कुछ काम है। मेरी मदद कर दो।” रत्ना जी ने तारा से कहा।

तारा ने उनकी बात पर हामी भरी और रत्ना जी के साथ ऊपर कमरे में गई। ऊपर कमरे में ध्रुव और ग्रीष्मा मौजूद थे। तारा को समझ नहीं आया कि रत्ना जी उसे ऊपर लेकर क्यों आई हैं?

“क्या हुआ आंटी? आप मुझे यहाँ क्यों लेकर आई हैं?” उसने पूछा।

“पिछले दिनों में मैंने नोटिस किया है कि तुम ग्रीष्मा के बहुत क्लोज़ हो गई हो। मैं चाहती हूँ कि तुम इन दोनों को समझाओ।”

“ग्रीष्मा को तो मैं समझा दूँगी, लेकिन ध्रुव सर को समझाना मतलब भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर है।” तारा के कहते ही ध्रुव उसकी तरफ़ घूरकर देखने लगा। “मेरे कहने का मतलब है ध्रुव सर पहले से इतने समझदार हैं, उन्हें कुछ समझाने की क्या ज़रूरत? वैसे समझाना क्या है आंटी?” तारा ने पूछा।

“हमारे फ़ैमिली ट्रेडिशन के हिसाब से लड़की फ़ेरों में लंबा घूँघट डालकर बैठती है और लड़का चेहरे पर सेहरा लगाकर… ताकि उसे वहाँ मौजूद लोगों की बुरी नज़र ना लगे। दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे का चेहरा शादी के बाद अपनी पहली रात के वक़्त देखते हैं।”

“काफ़ी अजीब रिवाज़ है। लेकिन दिक्कत क्या है?”

“दिक्कत ये है कि ये दोनों ही इस रिवाज़ को नहीं मानना चाहते।” रत्ना जी ने बताया।

“हम क्या ग़लत कह रहे हैं माँ? आप खुद बताइए कि हम इतने मॉडर्न हो चुके हैं। पर्दा प्रथा जैसी प्रथा पुराने ज़माने में होती थी और ये एक तरह की कुप्रथा मानी जाती है। हमारे देश के सोशल वर्कर्स ने इन सब को हटाने में इतनी मेहनत की है और आप हैं कि रिवाज़ के नाम पर इन्हें फ़ॉलो करना चाहती हैं।” ध्रुव ने अपना तर्क रखा।

“मैं उम्र भर ग्रीष्मा को पर्दे में रहने के लिए नहीं कह रही। तुम अच्छे से जानते हो हमारे घर में बहुओं को भी उतनी ही आज़ादी है, जितनी इस घर की बेटियों को… मैंने और माँ सा ने कभी इस बात की ज़िद नहीं की कि ग्रीष्मा शादी के बाद हमारे हिसाब से रहेगी।”

“तो अब आप दोनों ज़िद क्यों कर रही हैं? ये क्या मतलब हुआ? मैं अपनी शादी में अपनी दुल्हन को देख तक नहीं पाऊँगा और ना ही वो मुझे?”

“तो क्या हुआ बेटा? शादी के बाद देख लेना। ग्रीष्मा तुम्हारी है और अब उम्र भर इसे ही देखना है।“ रत्ना जी बोलीं।

ध्रुव और रत्ना जी की बहस बढ़ने लगी। वो बार-बार ध्रुव को इस रस्म को मानने के लिए कह रही थी, जबकि ध्रुव उनके सामने अलग-अलग तर्क रख रहा था। उन दोनों की बहस में तारा और ग्रीष्मा चुपचाप खड़ी थीं।

“तारा अब तुम ही समझाओ इन दोनों को…” रत्ना जी तारा की तरफ़ देखकर बोलीं।

“मुझे कहते हुए बहुत दुख हो रहा है, लेकिन पहली बार मैं ध्रुव सर की बात से इत्तेफ़ाक़ रखती हूँ। आंटी, यहाँ जो भी मौजूद है, वो सब हमारे अपने ही हैं और अपनों की कैसे बुरी नज़र लगना? वो यहाँ आशीर्वाद देने आए हैं।”

तारा की बात सुनकर ध्रुव झट से बोला, “चलो शुक्र है।”

रत्ना जी की सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं। वो ध्रुव की ज़िद के आगे घुटने टेकने ही वाली थीं कि तभी ग्रीष्मा ने कहा, “लेकिन मैं मम्मी जी की बात से सहमत हूँ। मुझे ये रिवाज़ करने में कोई दिक्कत नहीं है।”

ग्रीष्मा की बात सुनकर रत्ना जी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी, तो वहीं ध्रुव और तारा दोनों ही उसकी तरफ़ हैरानी से देख रहे थे।

★★★★

हेलो रीडर्स…

पाठ पढ़ने के बाद समीक्षा ज़रूर करिएगा। आपको तारा की थिंकिंग कैसे लगती है? कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताइएगा। क्या आपके यहाँ भी घूँघट रखने जैसी चीज़ अभी भी रिवाज़ के नाम पर मानी जाती है?

कीप सपोर्टिंग ऑलवेज़…

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