The Replaced bride - Chapter 17
The Replaced brideउम्मीद भवन पैलेस में ध्रुव और ग्रीष्मा की शादी हो रही थी। ग्रीष्मा को अचानक अपने छोटे भाई की मौत की खबर मिली; तो वह तारा को अपनी जगह बिठाकर वहाँ से चली गई।
ग्रीष्मा को गए लगभग आधे घंटे हो चुके थे। तारा उसकी जगह बैठ तो गई थी, लेकिन घबराहट के मारे उसकी हालत खराब थी।
“अब तक तो कमरे में कोई नहीं आया, लेकिन अभी तो मुझे डेढ़ घंटे और बिताने हैं। प्लीज भगवान जी, कुछ गड़बड़ मत होने देना और ग्रीष्मा को जल्दी से यहां भेज देना।” घबराहट में तारा जल्दी-जल्दी इधर-उधर चहल-कदमी कर रही थी।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो तारा जल्दी से जाकर कुर्सी पर बैठ गई और उसने अपने चेहरे पर लंबा सा घूंघट ले लिया।
“अरे, हम भी तो देखें हमारी होने वाली बहू रानी कैसी लग रही है?” यह ध्रुव की मामी की आवाज थी, जो कि उसकी माँ रत्ना के साथ वहाँ आई थी।
“बिल्कुल नहीं, भाभी। अब तो ग्रीष्मा का चेहरा सबसे पहले ध्रुव ही देखेगा…वह भी शादी की रात पर…” रत्ना ने मुस्कुराकर जवाब दिया।
दोनों कमरे में दाखिल हो चुकी थीं। अंदर आते ही ध्रुव की माँ ने ग्रीष्मा समझकर तारा की नज़र उतारी।
“माता रानी, तुम दोनों को हर एक बला से दूर रखें।” उन्होंने तारा के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।
“अच्छा, जीजी। अब आशीर्वाद बाद में दीजिएगा। पंडित जी फेरों के लिए दुल्हन का इंतज़ार कर रहे हैं। ध्रुव की रस्में तो हो चुकी हैं, अब दुल्हन का आना बाकी है।”
मामी के कहते ही रत्ना जी हँसकर बोलीं, “हाँ, मैं तो भूल ही गई थी। ग्रीष्मा, बेटा। पंडित जी ने बोला है कि 2:30 घंटे बाद वाले मुहूर्त से ज़्यादा अच्छा यह वाला मुहूर्त है, तो हमने सोचा शादी इसी मुहूर्त में करवा देते हैं।”
उनकी बात सुनकर तारा वहीं पर जड़ हो गई। “हे भगवान, ग्रीष्मा तो 2 घंटे बाद आने वाली थी। मुझे कैसे भी करके इन्हें रोकना होगा।” तारा ने अपने मन में कहा।
तारा उन्हें रोकने के लिए कुछ कह पाती, उससे पहले रत्ना जी और मामी ने उसे कुर्सी से उठाया और बाहर ले जाने लगीं।
हड़बड़ाहट में तारा को कुछ बोलने का मौका नहीं मिला। वह बहुत घबरा गई थी। उसने घूंघट के अंदर से ग्रीष्मा को कॉल लगाया, तो उसका फोन आउट ऑफ़ रीच आ रहा था।
“अब मैं ग्रीष्मा को कैसे बताऊँ? मुझे…मुझे कैसे भी करके उसे यहाँ बुलाना होगा।” तारा ने सोचा। उसने रत्ना को रोककर इशारे से बाथरूम जाने को कहा।
“अच्छा, ठीक है, लेकिन जल्दी आना। मैं साक्षी को तुम्हारे पास भेजती हूँ।” रत्ना जी ने कहा और मामी को लेकर वहाँ से चली गईं। उन्होंने साक्षी को ग्रीष्मा के पास जाने के लिए कहा।
कमरे में वापस आते ही तारा ने अपना घूंघट हटाया। साक्षी ने घूंघट के पीछे ग्रीष्मा के बजाय तारा को देखा, तो वह चौंक गई।
“तारा दीदी, आप? आप ग्रीष्मा की ड्रेस में क्या कर रही हैं? और वह कहाँ है?” साक्षी ने उसके सामने सवालों की झड़ी लगा दी थी।
“अभी यह सब बताने का टाइम नहीं है, साक्षी। ग्रीष्मा किसी वजह से बाहर गई है और उसने मुझे अपनी जगह बैठने को कहा है। मुझे नहीं पता था कि शादी के फेरों का मुहूर्त भी प्रीपोन हो जाएगा। मैं ज़्यादा देर यहाँ नहीं रुक सकती। तुम ग्रीष्मा को कॉल करके बोलो कि वह अभी के अभी वापस आ जाए।”
“क्या ज़रूरत है उसके वापस आने की? मैं तो कहती हूँ आप ही ध्रुव भैया से शादी कर लीजिए।”
“यह मज़ाक करने का टाइम नहीं है, साक्षी…” तारा गुस्से में बोली, “ग्रीष्मा का फोन नहीं लग रहा। मैं एक बार और ट्राई करके देखती हूँ, अगर उसका कॉल लग जाए तो अच्छी बात है, वरना तुम उसे कॉल करने की ट्राई करती रहना। फेरों से पहले तक अगर ग्रीष्मा ना आई तो तुम सबको बता देना कि घूंघट के पीछे ग्रीष्मा नहीं, मैं हूँ।”
“लेकिन अचानक सब को पता चला तो सब आपसे गुस्सा हो जाएँगे।”
“गुस्सा हो जाएँगे तो हो जाने दो। मैं अभी उन्हें सब बता देती, लेकिन ग्रीष्मा जिस काम से गई, उसका पता उनके माँ-बाप को चला तो वे टूट जाएँगे। अभी के लिए मैं उसकी जगह बैठ जाऊँगी…लेकिन बस आधे घंटे के लिए…” तारा ने गुस्से में कहा। वह बार-बार ग्रीष्मा को कॉल करने की कोशिश कर रही थी।
“तारा दीदी…प्लीज यह सब मत कीजिए। घरवाले शादी के बाद कुछ नहीं कर पाएँगे…लेकिन बीच में उन्हें सब पता चला तो वे सच में बहुत गुस्सा करेंगे।” साक्षी ने कहा।
“उनके गुस्से के डर से मैं ध्रुव सिंघानिया से शादी तो नहीं कर सकती। मुझे ग्रीष्मा को मदद करने के लिए हाँ कहनी ही नहीं चाहिए थी।” ग्रीष्मा के ना आने की वजह से तारा बुरी तरह घबरा गई थी। उसने एक बार फिर उसे कॉल लगाया और इस बार किस्मत से ग्रीष्मा ने फोन उठा लिया था।
“क्या हुआ, तारा? वहाँ सब ठीक तो है ना?” उसने फोन उठाते ही पूछा।
“कुछ ठीक नहीं है, ग्रीष्मा। आप जहाँ भी हैं, वहाँ से अभी इसी वक्त वापस आ जाइए। मुझे नहीं पता यह सब कैसे हुआ, लेकिन इन्होंने पंडित जी से बात करके शादी के मुहूर्त को पहले करवा लिया है। यहाँ शादी की रस्में शुरू हो चुकी हैं।” तारा ने घबराई आवाज़ में कहा।
“अच्छा, ठीक है, घबराओ मत…तुम फेरों के लिए चली जाओ, मैं तब तक आ जाऊँगी और आकर शादी रोक दूँगी। अगले मुहूर्त में मेरी और ध्रुव की शादी हो जाएगी। डोंट वरी, कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। मैं सबको सारी बात समझा दूँगी।” ग्रीष्मा ने तारा को समझाया।
तारा ने उसकी बात पर हामी भरी और फिर से घूंघट पहनकर साक्षी के साथ नीचे गई। मंडप में पहले से ही ध्रुव मौजूद था। उसके चेहरे पर सेहरा लगाया हुआ था, जबकि तारा लंबे घूंघट में थी। वह उसके पास जाकर बैठ गई।
उसके बैठते ही शादी की बाकी की रस्में शुरू हो गईं। ग्रीष्मा को कॉल किए लगभग 1 घंटे हो गए थे, लेकिन फिर भी वह अब तक नहीं आई थी। तारा बार-बार उसे फोन मिला रही थी, लेकिन अब उसका फोन बंद आ रहा था।
“तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती। तुम्हें यहाँ आकर सब कुछ सच बताना होगा। आज इस मंडप में मेरी जगह तुम्हें होना चाहिए था। मैं इतने लोगों को धोखा नहीं दे सकती। साक्षी…साक्षी, प्लीज शादी होने से पहले सब कुछ सच बता दो।” तारा अपने मन में सोच रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे।
दूसरी तरफ साक्षी को सब कुछ पता होने के बावजूद उसने किसी को कुछ नहीं बताया। “मैं जानती हूँ, तारा दीदी, कि आप ध्रुव भैया से शादी नहीं करना चाहतीं, लेकिन ध्रुव भैया के लिए आप एक बेस्ट लाइफ पार्टनर साबित होंगी। हमने आपको पहले ही समझाया था कि ग्रीष्मा पर विश्वास मत करो। वह सबको धोखा दे रही है। अच्छा हुआ जो वक्त रहते यहाँ से चली गई। अब ध्रुव भैया की शादी सच में एक अच्छी लड़की से हो रही है।” साक्षी ने सोचा। उसने चुप रहने का फैसला किया और किसी को कुछ नहीं बताया।
साक्षी के बीच में ना आने पर तारा ने खुद ही शादी से खड़े होने का डिसीज़न लिया। वह उठने ही वाली थी, तभी पंडित जी ने कहा, “अब वर और वधू फेरों के लिए खड़े हो जाइए।”
तारा कुछ कर पाती, उससे पहले सरिता जी उसके पास आईं और उन्होंने उसे हाथ पकड़कर खड़ा किया। बीतते हर पल के साथ चीज़ें उसके हाथ से निकल रही थीं।
ध्रुव और उसके फेरे भी हो चुके थे। पंडित जी ने एक मंत्र पढ़ा और फिर ध्रुव से कहा, “अब आप कन्या का घूंघट उठाकर उसे सिंदूर दान कीजिए। उससे पहले भगवान के सामने अपनी खुशी और मंगल जीवन की प्रार्थना कीजिए।”
ध्रुव ने हाथ जोड़े और आँख बंद करके भगवान से प्रार्थना करने लगा। रत्ना जी ने उसे सिंदूर की डिब्बी पकड़ाई।
“सिंदूर लगाने के लिए ध्रुव मेरा घूंघट उठाएगा, तब सबको पता चल ही जाएगा कि यहाँ ग्रीष्मा के बजाय मैं मौजूद हूँ। इसी बहाने हम दोनों की शादी भी रुक जाएगी।” तारा के उदास चेहरे पर एक उम्मीद की किरण थी।
जैसे ही ध्रुव सिंदूर लगाने से पहले तारा का घूंघट उठाने लगा, उसकी दादी गायत्री जी बोलीं, “अरे, ध्रुव, दुल्हन का चेहरा नहीं देखना। घूंघट के अंदर से ही सिंदूर लगा दो।”
तारा कुछ कह पाती, उससे पहले ध्रुव ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसकी मांग में सिंदूर लगा दिया था। उसके बाद उसने मंगलसूत्र पहनाया।
ग्रीष्मा अभी तक वहाँ नहीं पहुँची थी। ना चाहते हुए भी ध्रुव और तारा की शादी हो चुकी थी।
“यह क्या किया तुमने, साक्षी? मैंने तुम्हें कहा था कि सब कुछ सच बता देना, फिर भी तुम कुछ नहीं बोली। अब सबको सच पता चलेगा तो सब मुझे ही गलत समझेंगे। ग्रीष्मा यहाँ आएगी तो…उसे यही लगेगा कि मैंने जानबूझकर ध्रुव से शादी कर ली।” तारा ने सोचा।
उसके साथ क्या हो रहा था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। घूंघट के अंदर ही तारा और ध्रुव के शादी के बाद की बाकी की रस्में करवाई गईं। उसके बाद रत्ना जी तारा को एक कमरे में लेकर गईं, जो ध्रुव और उसके लिए सजाया गया था।
“मेरे ध्रुव को अब मैं तुम्हारे हाथों में सौंपती हूँ। उसे हमेशा प्यार करना। भले ही सामने से सब पर चिल्ला देता होगा, लेकिन दिल का बहुत अच्छा है।” रत्ना जी ने तारा के सिर पर हाथ फेरकर कहा।
इसके बाद वह वहाँ से जा चुकी थीं। ध्रुव अभी तक अंदर नहीं आया था। आने वाले पल के बारे में सोचकर तारा की आँखों में आँसू थे।
“मैं कैसे इन सब का सामना कर पाऊँगी? इतने कम वक्त में इन्होंने मुझे इतना अपनापन दिया और मैंने इनके साथ धोखा किया। तुम क्यों नहीं आ पाईं, ग्रीष्मा? तुम्हारी वजह से आज मैं इन सब की नज़रों में गिर जाऊँगी…” तारा के चेहरे पर उदासी थी।
“मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी। इन सब के सवालों के जवाब अब तुम खुद दोगी।” तारा ने सख्त आवाज़ में कहा और अपना फोन उठाकर ग्रीष्मा को कॉल करने लगी।
“आप जिस नंबर पर ट्राई कर रहे हैं, वह अवैध है, कृपया कॉल करने से पहले एक बार नंबर जाँच कर लें।” जैसे ही तारा ने सुना, उसके हाथ से फ़ोन नीचे गिर गया।
ग्रीष्मा का फ़ोन नहीं लग रहा था। तारा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। तभी दरवाज़े पर किसी के बात करने की आवाज़ आ रही थी। तारा ने जल्दी से अपना घूंघट वापस पहन लिया।
“नहीं…नहीं, भाई। इतने सस्ते में हम आपको अंदर नहीं जाने देंगे। वैसे भी आपने शादी जल्दी करके आधी-अधूरी रस्में की हैं। इस चक्कर में हमें कोई नेक नहीं मिला। अब हम कुछ नहीं जानते। हमें पूरे पैसे चाहिए, हम कम्परोमाइज़ नहीं करने वाले।” यह साहित्य की आवाज़ थी।
“अच्छा जी…तुम दोनों ने कम्परोमाइज़ किया है? मैंने तुम दोनों को किसी चीज़ के लिए मना नहीं किया।” ध्रुव ने कहा और अपना वॉलेट निकालकर साहित्य के हाथ में रख दिया।
“और भाई, मेरा नेक?” साक्षी ने कहा।
“अच्छा, अब तुम बाकी रह गई क्या? पूरे दिन तो दोनों साथ घूमते रहते हो? दोनों आधे-आधे बाँट लेना। चलो, अब जाओ यहाँ से…” ध्रुव ने कहा।
“आपने यह मेरे साथ अच्छा नहीं किया, भाई। आपको पाप लगेगा।” साक्षी ने मुँह बनाकर कहा और साहित्य के साथ वहाँ से चली गई।
उन लोगों की आवाज़ें सुनकर तारा को समझ आ गया था कि ध्रुव अंदर आने वाला है।
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। उसने देखा ध्रुव अंदर आया था। उसके चेहरे पर खुशी थी। अंदर आते ही उसने सबसे पहले कमरे का दरवाज़ा बंद किया और तारा के पास आकर बैठ गया। तारा के चेहरे पर लंबा घूंघट था, लेकिन अगले ही पल उसकी सच्चाई सामने आने वाली थी।
★★★★
हेलो रीडर्स…
आज का सुपर एक्साइटिंग पार्ट आपको कैसा लगा? समीक्षा में ज़रूर बताइएगा। हाँ, तो आपको क्या लगता है सच्चाई जानने के बाद ध्रुव का क्या रिएक्शन होगा? क्या वह तारा की बात पर विश्वास करेगा कि ग्रीष्मा ने उसे खुद अपनी जगह वहाँ पर बिठाया था…या नहीं? या ग्रीष्मा अब वापस आएगी? ग्रीष्मा ने यह सब जानबूझकर किया या यह सब अनजाने में हुआ…?
जानने के लिए बने रहें अगले भाग तक…
कीप सपोर्टिंग ऑलवेज़