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Chapter 21

The Replaced bride - Chapter 21

The Replaced bride

साक्षी और साहित्य के रोकने के बावजूद तारा जल्दी से ध्रुव के परिवार के पास पहुंची। उस वक्त ध्रुव वहां मौजूद नहीं था। तारा को अकेले ही सबको सच बताना था। उसे अपने आस पास ना पाकर एक बार के लिए वो घबरा गई लेकिन जैसे तैसे हिम्मत करके वो उनकी तरफ बढ़ने लगी।

ऊपर खड़े साहित्य और साक्षी उन्हें देख रहे थे। दोनों मन ही मन तारा के लिए दुआ मांग रहे थे कि सब कुछ सही हो जाए।

“ये सेट देखिए मां..... मैंने खास ग्रीष्मा के लिए डिजाइन करवाया है ताकि उसे मुंह दिखाई में दे सकूं। ध्रुव ने बताया था ये एक्सक्लूसिव डिजाइन है।” रत्ना ने अपने हाथ में पकड़ा हार का बॉक्स गायत्री देवी की तरफ बढ़ाया। सरिता भी उनके साथ उसे देख रही थी।

“ये सच में बहुत खूबसूरत है। मेरी ग्रीष्मा बहुत लकी है कि उसे आप जैसे सास मिली, जो खुद से पहले उसके बारे में सोचती है।” सरिता ने मुस्कुरा कर कहा।

गायत्री देवी ने भी हार की तारीफ की। “महारे लिए भी कुछ बनवाया है या खुद ही अपनी बहू को सब देने का इरादा है।”

उनकी बात सुनकर रत्ना हल्का सा हंसी और एक दूसरा ज्वेलरी बॉक्स उठाकर उनकी तरफ बढ़ाया। “अरे नहीं नहीं मां सा, ऐसा हो सकता है क्या? आप घर में सबसे बड़ी है। सबसे पहले ग्रीष्मा आप ही के पैर छुएगी। ध्रुव ने ये कंगन बनवा कर दिए हैं।”

गायत्री देवी ने कंगन देखें। उन्हें वो पसंद आए। तारा उन से कुछ ही दूरी पर खड़ी उनकी तरफ देख रही थी। उसकी आंखें नम थी। बातें करते हुए उनकी नजर तारा पर पड़ी। उसे ग्रीष्मा के शादी के जोड़े में देखकर तीनों हैरान थी।

रत्ना जी उसके पास आकर बोली, “कहां थी तुम अब तक? और ये तुमने ग्रीष्मा के शादी का जोड़ा क्यों पहन रखा है? देखो मजाक मस्ती एक तरफ लेकिन हमारे यहां शादी के जोड़े का बहुत महत्व होता है। ये सुहाग की निशानी होती है, जो किसी के साथ नहीं बांटी जाती।” रत्ना जी के शब्दों में उनकी नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी। सरिता जी और गायत्री देवी भी तारा को उस तरह देख कर खुश नहीं थे।

रत्ना जी का ध्यान तारा की ड्रेस पर था लेकिन सरिता जी ने उसके मांग में सिंदूर और गले में पड़ा मंगलसूत्र देख लिया।

“तुम क्या किसी से शादी करके आई हो जो ये सब..... तुमने ये सिंदूर क्यों लगा रखा है और गले में मंगलसूत्र?” सरिता जी हैरानी से बोली।

उनकी बात सुनकर रत्ना जी तारा के पास आई और गले में पड़े मंगलसूत्र की तरफ देखा। “ये तो वही है, जो ध्रुव ने ग्रीष्मा के लिए बनवाया था। ये तुम्हारे गले में क्या कर रहा है?”

तारा को बोलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। सरिता जी गुस्से में उस पर बरस पड़ी। “सिंघानिया फैमिली ने तुम्हें बहुत प्यार दिया होगा लेकिन मैं ये कभी बर्दाश्त नहीं करूंगी कि तुम मेरी बेटी के सुहाग की निशानी और उसके शादी का जोड़ा पहन कर घूमो। चलो अभी के अभी इसे निकालो।”

गायत्री देवी अपनी व्हीलचेयर चलाते हुए उनके पास आकर बोली, “चुप हो जाओ तुम दोनों..... छोरी को कुछ बोलने दोगी या नहीं? तूने बताया नहीं तारा, ग्रीष्मा बहू के शादी का जोड़ा और उसका मंगलसूत्र तुम्हारे पास कहां से आया?”

तारा ने घबराहट में अपना थूक निगला और जैसे तैसे सब बताने के लिए मुंह खोला, “ये सब मैंने इसलिए पहन रखा है क्योंकि ध्रुव सर की शादी मुझसे हुई है, ग्रीष्मा से नहीं।” उसने बिल्कुल धीमी आवाज में कहा।

एक पल के लिए वहां बिल्कुल चुप्पी छा गई। ऊपर खड़े साहित्य और साक्षी का दिल जोरों से धड़क रहा था।

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तारा की बात सुनकर रत्ना जी गुस्से में बोली , “इस तरह का मजाक फिर कभी मत करना। मुझे तो ग्रीष्मा पर गुस्सा आ रहा है। वो अपना सामान तुम्हें दे भी कैसे सकती हैं? कहां है ग्रीष्मा?”

“शांत हो जाओ रत्ना बहू.....” गायत्री देवी ने उन्हें फिर चुप करवाया। उन्होंने तारा के चेहरे की तरफ देखा जो नज़रे झुकाकर नीचे की तरफ देख रही थी। “ये तुम क्या बोल रही हो तारा? देखो इस तरह के मजाक शोभा नहीं देते। और ध्रुव कहां हैं?” उन्होंने नरमी से पूछा।

उन तीनों के बर्ताव को देखकर साफ था कि वो काफी गुस्से में थी। तारा को समझ नहीं आ रहा था कि वो आगे की बात उन्हें कैसे बताएं। वो चुपचाप वहां खड़ी थी।

उसे चुप देख कर सरिता जी ने कहा, “ये ऐसे कुछ नहीं कहने वाली... ग्रीष्मा के पापा कहां है? मैं उन्हें बुलाती हूं। पता नहीं इस लड़की को यहां लेकर कौन आया है?” सरिता जी ने तुरंत फोन करके भावेश जी को बुलाया। वो उस वक्त पैलेस में ही मौजूद थे। कुछ ही मिनटों में वो भी वहां मौजूद थे और वहां हो रहे तमाशे को देखकर हैरान थे।

“ग्रीष्मा कहां है तारा?” उन्होंने गुस्से में पूछा।

“मैं नहीं जानती वो कहां है?” तारा ने जवाब में कहा, “आखिरी बार मैंने शादी से पहले उन्हें देखा था। उनके पास एक फोन आया था, जिसमें किसी ने उन्हें ये कहा था कि उनका भाई न्यूयॉर्क से उन्हें सरप्राइज देने आ रहा है और रास्ते में उसकी एक्सीडेंट में मौत हो गई।”

तारा अपनी बात खत्म कर पाती उससे पहले सरिता जी गुस्से में उसके पास आई। “देखो कैसे बेशर्मो की तरह झूठ बोले जा रही है? और सारा इल्जाम मेरी बेटी पर लगा रही है? ग्रीष्मा हमारी इकलौती संतान है। उसका कोई भाई नहीं है। किसकी मौत की बात कर रही हो तुम?” बोलते हुए वो रोने लगी।

रत्ना जी उनके पास आई और उन्हें संभालते हुए कहा, “खुद को संभालिए..... ग्रीष्मा ठीक होगी।”

“मैं सच कह रही हूं आंटी..... ग्रीष्मा ने मुझे यही कहा था कि वो शादी से पहले लौट आएगी लेकिन वो अब तक नहीं आई। उन्होंने मुझे कहा था कि अगर अचानक से आपको उनके भाई की मौत की खबर मिलेगी तो आप लोग टूट जाएंगे। ग्रीष्मा ने मुझसे रिक्वेस्ट की थी कि मैं उनकी जगह कुछ देर बैठ जाऊं। वो वापस आ जाएगी लेकिन वो नहीं आई। यकीन मानिए इनमें इन सब में मेरी कोई गलती नहीं है।” तारा ने आगे की बात जैसे तैसे कर बता दी। वो उन्हें यकीन दिलाने का पूरा कोशिश कर रही थी लेकिन कोई भी उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा था।

“ग्रीष्मा तुझे अपनी जगह बैठा कर चली गई और तुम बैठ भी गई? चलो बैठ गई सो बैठ गई, तुमने ध्रुव से शादी भी कर ली। हम लोगों के बाल धूप में सफेद नहीं हुए हैं। अच्छे से जानते हैं तुम जैसे लोगों को.....” भावेश जी ने गुस्से में कहा।

“मैं तो कहती हूं अभी इसी वक्त पुलिस को बुलाइए और इस लड़की को जेल मैं डलवा दीजिए। कहीं उसने मेरी बेटी को कुछ कर तो नहीं दिया।” सरिता जी ने रोते हुए कहा।

उनकी बात सुनकर तारा घबरा गई। उसने आसपास देखा लेकिन साहित्य और साक्षी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे थे। “प्लीज आप सब मेरी बात का यकीन कीजिए। साक्षी..... साक्षी कहां है? उसे इन सब के बारे में सब पता है। हम दोनों ने ग्रीष्मा से बात भी की थी, जब उसने ये कहा था कि वो आकर शादी रुकवा देगी। मैंने साक्षी से कहा था कि ग्रीष्मा ना आप आए फिर भी शादी रुकवा देना लेकिन वह..... उसने शादी नहीं रुकवाई।”

“साक्षी तो बच्ची है, आ गई होगी तुम्हारी बातों में.....वैसे भी मैंने ध्यान दिया है कि दोनों बच्चो का तुमसे अच्छा खासा लगाव हो गया था। जब से तुम आई हो तुम्हारे आस-पास ही रहते थे।” रत्ना जी ने कठोरता से जवाब दिया।

“आप एक बार साहित्य और साक्षी से बात करके तो देखिए, वो यहीं कहीं होंगे।” कहकर तारा साक्षी और साहित्य को आवाज लगाने लगी। “साहित्य.....साक्षी कहां हो तुम दोनों?” बोलते हुए उसकी नजर ऊपर की तरफ गई तो दोनों खड़े नीचे की तरफ देख रहे थे। ‌“प्लीज नीचे आ जाओ और सबको सच बताओ।”

तारा की बात सुनकर साक्षी और साहित्य ने एक दूसरे की तरफ देखा। वो दोनों धीमे कदमों से चलते हुए नीचे आ रहे थे।

उनके पास आते ही तारा ने साक्षी का हाथ पकड़ कर कहा, “साक्षी प्लीज सब को सच बता दो। बता दो सबको कि तुम्हे पहले से पता था कि घूंघट के पीछे ग्रीष्मा नहीं, मैं थी। इन सब में मेरी कोई गलती नहीं है।”

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तारा साक्षी की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही थी, तो वहीं घरवालों की नजरें भी साक्षी पर टिकी थी। साक्षी ने तारा का हाथ झटका और धीमी आवाज में कहा, “ये आप क्या कह रही हैं तारा दीदी? मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। मम्मी..... मुझे तो खुद अभी पता चल रहा है। आपको याद होगा, जब आप ऊपर इनके कमरे में आई थी, तब इन्होंने घुंघट पहना था। हम में से किसी ने उनका चेहरा नहीं देखा। मुझे नहीं पता कि ये झूठ क्यों बोल रही है।”

साक्षी के मुकरने के बाद तारा वहां पर जड़ हो गई। उसने एक नजर साहित्य की तरफ डाली।

साहित्य ने तुरंत उस से नजरें फेर ली और अनजान बनते हुए कहा, “ये तो वही ड्रेस है ना जो ग्रीष्मा भाभी ने अपनी शादी में पहनी थी? तारा दीदी आप इस ड्रेस में क्या कर रही हैं?”

उन दोनों की बातें सुनकर तारा की आंखों में आंसू थे। वो दोनों उसकी एकमात्र उम्मीद थी जो उसके सच को साबित कर सकते थे। ‌

“तुम दोनों झूठ क्यों बोल रहे हो? साक्षी..... ऊपर तुम दोनों ने वादा किया था कि तुम मेरी मदद करोगें।” तारा ने रोते हुए कहा।

“झूठ ये नहीं तुम बोल रही हो। मैं कहती हूं आप देर क्यों कर रहे हैं? पुलिस क्यों नहीं बुलवा लेते। कहीं इसने मेरी बेटी को मार तो नहीं दिया।” सरिता जी रोते हुए बोली।

“शुभ शुभ बोलिए बहन जी..... भगवान से दुआ कीजिए कि हमारी ग्रीष्मा जहां भी हो सही सलामत हो। आप फिकर मत कीजिए पुलिस सब पता लगा लेगी।” रत्ना जी ने उन्हें ढांढस बंधाया।

सब अपने-अपने तरीके से शोक मना रहे थे। इन सबके बीच गायत्री देवी ने कहा, “कहां अपने पोते की शादी के बारे में सोच कर खुश हो रही थी। सोचा था इतने सालों बाद घर में कोई शुभ अवसर आ रहा है। एक तो शादी तय समय से पहले कर ली, और अब ये सब तमाशा? भगवान जाने..... अब क्या कुछ देखना बाकी रह गया। मेरे ध्रुव की जिंदगी बर्बाद कर दी।”

“लेकिन आप सब लोग मुझे कसूरवार क्यों ठहरा रहे हैं? इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। आप अपनी बेटी के बारे में पता क्यों नहीं लगाते कि वो इस वक्त है कहां?” तारा ने गुस्से में कहा। उन सब लोगों की बातें सुनकर उसके सब्र का बांध टूट गया था। ऊपर से साक्षी और साहित्य का झूठ उसके गुस्से को बढ़ाने में काफी था।

“हिम्मत तो देखो इस लड़की की, इतना सब कुछ करने के बावजूद भी हम पर ही चिल्ला रही हैं।” भावेश जी ने तारा को घूर कर देखा। वो पुलिस को कॉल कर रहे थे।

तारा उनके पास आई और उन्हें रोकते हुए कहा, “प्लीज अंकल..... अप पुलिस को क्यों इंवॉल्व कर रहे हैं? मेरी कोई गलती नहीं है। आप मुझे बेवजह इन सब में घसीट रहे हैं। मेरी वजह से किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं हुई है। मैं अभी यहां से चली जाऊंगी। उसके बाद आपको ध्रुव सर की शादी जिसके साथ करनी है, आप कर सकते हैं।”

“ऐसे कैसे चली जाओगी? जब तक हमें ग्रीष्मा का पता नहीं चल जाता, तुम कहीं नहीं जा सकती।” रत्ना जी सख्त लहजे में बोली।

“ऐसा ही होता है,जब किसी के बारे में बिना सोचे समझे उसे काम पर रखते हैं। मेरी ग्रीष्मा भोली थी, जो इसका मासूम चेहरा देखकर इस पर तरस खा गई। मुझे अभी के अभी तुम्हारे मम्मी पापा के नंबर बताओ, मैं उन्हें कॉल करके तुम्हारी करतूतों के बारे में बताती हूं कि कैसे तुम काम के बहाने अमीर लड़कों को फंसाकर उनसे शादी करती हो। अब तक कितनी शादियां की है तुमने?” गुस्से में रत्ना जी ने कसकर तारा का हाथ पकड़ रखा था।

भावेश जी पुलिस से बात करने के लिए एक कोने में गए। कुछ मिनट बाद वो वहां आए और कहा, “मेरी यहां के एसीपी से बात हो चुकी है। उन्होंने कहा है कि इस लड़की को कहीं जाने ना दें। बाकी उन्हें अच्छे से पता है कि इस जैसे लोगों से कैसे निपटना है।”

पुलिस के आने का नाम सुनकर साहित्य और साक्षी भी घबरा गए तो वही तारा भी उन सबके बीच फंस चुकी थी। इस वक्त वहां ऐसा कोई नहीं था जो उसकी मदद कर सके और उसे इन परिस्थितियों से निकाल सके।

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