The Replaced bride - Chapter 20
The Replaced brideसाक्षी ने तारा की शादी ध्रुव से हो जाने की बात साहित्य को बता दी। पूरी बात जानने के बाद साहित्य ने साक्षी का साथ देने का फैसला किया। दोनों इस बारे में बात करने के लिए ध्रुव और तारा के कमरे के आगे थे।
कमरे का दरवाजा देर तक बंद देखकर साहित्य ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है, डब्बू, इन दोनों के बीच सुलह हो गई होगी?”
साक्षी ने उसकी बात का जवाब देने के बजाय घड़ी में टाइम देखा और कहा, “8:00 बजने वाले हैं, अब तक कोई हंगामा नहीं हुआ। लग तो यही रहा है कि दोनों के बीच सब ठीक है। आई विश कि दोनों के बीच सुलह हो जाए।”
“दोनों साथ में कितने अच्छे लगते हैं ना? मैं तो सोचकर ही एक्साइटेड हो रहा हूँ… ध्रुव एंड तारा… ध्रुव तारा। तुम्हें कभी नोटिस किया कि ध्रुव भैया और तारा भाभी का नाम एक साथ लिया जाता है?”
“हाँ, और भगवान करे दोनों हमेशा एक साथ रहें। इनका तो कोई हैशटैग बनाने की भी ज़रूरत नहीं है। ध्रुव तारा… एक दूसरे के साथ और एक दूसरे के लिए।” साक्षी ने खुश होकर कहा।
कमरे के दूसरी तरफ ध्रुव और तारा खड़े थे। उन दोनों ने साहित्य और साक्षी की सारी बातें सुन ली थीं। दोनों एक दूसरे की तरफ घूर कर देख रहे थे।
“मतलब तुमने मेरे भाई और बहन को भी अपनी साइड कर लिया?” ध्रुव ने गुस्से में, लेकिन दबी आवाज़ में कहा।
“आपने सुना ना? साक्षी और साहित्य क्या बातें कर रहे हैं? इन दोनों को हमारी शादी के बारे में पता है। देखा, मैं सच बोल रही थी। मैंने आपसे जानबूझकर शादी नहीं की। आपकी उस ग्रीष्मा ने मुझे बेवकूफ बनाकर अपनी जगह मंडप में बैठा दिया।”
“उसने बेवकूफ बनाया और तुम बन गईं? ऐसे तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती थीं। मैं तारा हूँ… मैं ये कर दूँगी… वो कर लूँगी… मैं सब कर सकती हूँ। तब तुम्हारी इंटेलिजेंस कहाँ गई थी?” ध्रुव ने धीमी आवाज़ में कहा।
दोनों एक दूसरे से धीमी आवाज़ में बहस कर रहे थे। ध्रुव की बात सुनकर तारा ने कहा, “जो हो गया, सो हो गया… उसे छोड़िए। अब तो आपको मेरी बात पर यकीन हो गया ना? अब मुझे यहाँ से जाने दीजिए।”
“मैंने कहा ना, जब तक ग्रीष्मा खुद आकर मुझे सब सच नहीं बता देती, तब तक तुम कहीं नहीं जा सकती। अभी तो तुम्हें मेरी और ग्रीष्मा की फैमिली का भी सामना करना है।”
ध्रुव की बात सुनकर तारा और भी गुस्सा हो गई। वो उसे कुछ जवाब दे पाती, तभी साक्षी और साहित्य ने बाहर से दरवाज़ा खटखटाया।
“भाभी… भैया आप दोनों जाग गए हैं क्या? हमें ऐसा क्यों लग रहा है कि आप दूसरी तरफ खड़े होकर बातें कर रहे हैं?” साहित्य ने धीमी आवाज़ में कहा।
ध्रुव ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और कमरे का दरवाज़ा खोला। वो साक्षी की तरफ गुस्से में देख रहा था। उसे देखकर साक्षी ने नज़रें नीची कर लीं।
“जो भी कहना है, अंदर आकर कहो।” ध्रुव के कहते ही दोनों अंदर आ गए। ध्रुव ने फिर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
“तारा भाभी…” साक्षी ने तारा की तरफ देखा। वो आगे कुछ बोल पाती, उससे पहले तारा गुस्से में उस पर बिफर पड़ी। “तुम मुझसे बात ना ही करो तो बेहतर होगा। साक्षी, मैंने तुम्हें कहा था ना, अगर ग्रीष्मा ना आए तो शादी रुकवा देना। फिर तुम आगे क्यों नहीं आई? आज तुम्हारी वजह से मैं कितनी बड़ी प्रॉब्लम में फंस गई हूँ। मेरी शादी इस राक्षस से हो गई और अब ये मुझे यहाँ से जाने नहीं दे रहा।”
“हाँ, साक्षी… आज तुम्हारी वजह से मुझे इस पागल लड़की के साथ रहना पड़ रहा है।” ध्रुव ने गुस्से में जवाब दिया।
“आपने मुझे पागल कहा?” तारा गुस्से में बोली।
“और तुमने कुछ देर पहले मुझे राक्षस कहा, उसका क्या? अगर मैं बुरा इंसान होता तो आज तुम्हारे यहाँ खड़े रहकर बातें नहीं कर रहा होता… सीधा पकड़कर तुम्हें पुलिस स्टेशन लेकर जाता। मैं तुम्हारा साथ दे रहा हूँ, ये बड़ी बात नहीं है?” ध्रुव ने जवाब दिया।
“आप मेरा साथ दे रहे हैं क्योंकि आप अच्छे से जानते हैं कि मैं झूठ नहीं बोल रही। जो झूठा है, वो आज यहाँ पर मौजूद नहीं है।”
उन दोनों को आपस में बहस करता देख साक्षी बीच में बोली, “भाई, भाभी आप लोग आपस में बहस क्यों कर रहे हैं? आप दोनों आपस में ही झगड़ा करते रहोगे तो घरवालों से बात कैसे करोगे? बाहर सभी शादी के बाद होने वाली देव पूजा के लिए आपका वेट कर रहे हैं। आपको उनका भी तो सामना करना है।”
“मैं क्यों उनका सामना करूँ? मेरी कोई गलती नहीं है।” ध्रुव ने कंधे उचकाकर कहा।
“तो क्या मेरी गलती है? सारी गलती उस झूठी ग्रीष्मा की है। पता नहीं कहाँ भाग गई। एक बार मिलने दो, उसे मैं उसका सर फोड़ दूँगी।” ग्रीष्मा के बारे में सोचकर तारा को रह-रहकर गुस्सा आ रहा था।
“उसकी कोई गलती नहीं है। मुझे तो डर लग रहा है कहीं वो किसी मुसीबत में ना हो। याद है हमें लिफ्ट में वो आदमी मिला था और उसने मुझे धमकी दी थी कि वो मेरी और ग्रीष्मा की शादी नहीं होने देगा।” ध्रुव ने परेशान होकर कहा।
उसकी बात सुनकर तारा, साहित्य और साक्षी भी परेशान हो गए। अब तक वो ग्रीष्मा को गलत समझ रहे थे, लेकिन अब उन्हें उसकी फ़िक्र होने लगी।
तारा ने ध्रुव को आश्वासन देते हुए कहा, “ग्रीष्मा जहाँ भी होगी, वो ठीक होगी। वो अपनी मर्ज़ी से गई है।”
“नहीं तारा, वो अपनी मर्ज़ी से नहीं, तुम्हारी बेवकूफी की वजह से गई है। अगर वो मुझे बताने की कंडीशन में नहीं थी तो तुम तो आकर बता सकती थीं? क्या ज़रूरी था ये टीवी सीरियल की ड्रामा खेलकर घूंघट में बैठने का? माना बड़ों के डर से तुमने कुछ नहीं कहा और कमरे में बैठी रहीं, लेकिन तुमने शादी तक कर ली? सॉरी टू से, लेकिन तुम भी कहीं से भी सही नहीं हो।” ध्रुव का सारा गुस्सा तारा पर निकल रहा था। उसने अपनी बात कही और कमरे से बाहर चला गया।
ध्रुव के वहाँ से जाते ही तारा ने साक्षी की तरफ देखकर कहा, “ये तुमने अपने बचपन में क्या कर दिया, साक्षी? तुम लोगों को ग्रीष्मा पसंद नहीं थी, लेकिन ध्रुव उससे प्यार करता था।”
“भाई भले ही उससे प्यार करते होंगे, लेकिन वो नहीं करती थी। अगर वो उनसे प्यार करती तो उन्हें चीट करके आपको वहाँ बैठाकर नहीं जाती, तारा भाभी।” साहित्य ने जवाब दिया।
“और क्या हो जो ध्रुव सच बोल रहा हो? पहले तो मुझे भी ग्रीष्मा गलत लग रही थी, लेकिन अब लिफ्ट वाले आदमी के बारे में सोचकर मुझे उसके लिए डर लग रहा है। कहीं सच में वो कोई मुसीबत में तो नहीं…”
“कौन सा लिफ्ट वाला आदमी?” साक्षी ने हैरानी से पूछा।
“हम लोग शॉपिंग करके बुटीक से वापस आ रहे थे, तब हमें लिफ्ट में एक आदमी मिला था। वो ध्रुव सर का पुराना दुश्मन था। उसने धमकी दी थी कि वो ध्रुव सर और ग्रीष्मा की शादी नहीं होने देगा। ज़रूर ये उसका किया धरा है। हो सकता है ग्रीष्मा यहाँ वापस आ रही होगी और उसने रास्ते में उसे किडनैप कर लिया हो।”
साहित्य और साक्षी तारा की बात का कोई जवाब देते, इससे पहले उन्हें वहाँ किसी के आने की आहट हुई। तारा ने जल्दी से अपना घूंघट पहन लिया।
उन्होंने देखा रत्ना जी कमरे में आ रही थीं। उन्होंने साक्षी और साहित्य को वहाँ देखा तो कहा, “लो, मैं इन दोनों को पूरे घर में ढूँढ रही हूँ और ये यहाँ अपनी नई भाभी के साथ खड़े हैं।” बोलते हुए रत्ना जी ने इधर-उधर देखा, उन्हें ध्रुव कहीं दिखाई नहीं दिया। “ध्रुव उठ गया है क्या? मैंने तो उसे नहीं देखा?”
“वो भाई… मम्मी… अभी कुछ देर पहले ही उठे हैं।” साक्षी ने अटकते हुए जवाब दिया।
रत्ना जी ने जवाब में सिर हिलाया। तभी उनकी नज़र तारा पर पड़ी, जिसने लंबा घूंघट पहन रखा था। उसे देखकर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो उसके पास जाकर बोली, “ये घूंघट वाली रस्म सिर्फ़ फेरों के लिए थी। तुम्हें घूंघट पहन के रखने की कोई ज़रूरत नहीं है। चलो, हटाओ इसे…” रत्ना जी तारा का घूंघट हटाने लगीं, तभी साक्षी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी, वो भाभी अभी तक नहीं नहाई है ना, इसलिए हमें भी अपना चेहरा नहीं दिखा रही। आप नीचे चलिए, मैं इन्हें देव पूजा के लिए लेकर आती हूँ।” साक्षी ने बहाना बनाया।
“तुम बच्चे भी ना… कुछ ज़्यादा ही अजीब हरकतें नहीं कर रहे? और साक्षी तुम… पहले मैंने तुम्हें ध्रुव और ग्रीष्मा को जगाने का बोला, तब तुमने मुँह बना लिया और अब यहीं पर मौजूद हो। अब मैं तुम लोगों के कोई बहाने नहीं सुनूँगी। जल्दी से ग्रीष्मा को तैयार करके नीचे ले आओ। बेटा, मुहूर्त में देर हो रही है। ध्रुव को भी देखना है, पता नहीं सुबह-सुबह कहाँ चला गया।” बोलते हुए रत्ना जी वहाँ से चली गईं। उनके जाते ही उन तीनों ने राहत की साँस ली।
“मुझे बहुत डर लग रहा है।” तारा ने अपना घूंघट हटाकर कहा। “ये लोग मेरा यकीन तो कर लेंगे ना?”
“कुछ कह नहीं सकते… कोई आपका साथ दे या ना दे, लेकिन हम आपके साथ हैं, तारा भाभी…” साहित्य ने मुस्कुराकर कहा।
उन दोनों के साथ होने पर तारा को काफ़ी राहत महसूस हो रही थी। उसने दोनों को गले लगाया और कहा, “हालाँकि मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूँ, साक्षी, लेकिन तुम ही मुझे इस मुसीबत से बाहर निकाल सकती हो। बस इन्हें मेरी बात पर यकीन हो जाए। फिर मैं यहाँ से वापस चली जाऊँगी।”
तारा की बात सुनकर साहित्य और साक्षी ने एक दूसरे की तरफ देखा। तारा के वापस जाने के बाद उन्हें कुछ हज़म नहीं हुआ। वो दोनों ध्रुव और तारा को साथ देखना चाहते थे।
वो दोनों तारा से अलग हुए। साक्षी ने उससे कहा, “भाभी, कुछ देर बाद देव पूजा होने वाली है। उसके लिए आपको नीचे जाना होगा। प्लीज़ आप तैयार हो जाइए।”
“नहीं, साक्षी… ये सब पूजा, प्यार और अपनापन… इस पर मेरा नहीं, ग्रीष्मा का हक़ है। घरवालों को ये सच्चाई बतानी ही होगी… आई डोंट वांट की ग्रीष्मा किसी मुसीबत में हो और हम उस तक पहुँचें, तब तक बहुत देर हो जाए।” तारा ने हल्की भारी आवाज़ में कहा। पहली बार उसे इतना अपनापन मिल रहा था, लेकिन वो अच्छे से जानती थी कि इन सब पर उसका नहीं, किसी और का हक़ था।
“तारा भाभी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। घरवालों को सब बताने के लिए हमें नीचे जाना होगा ना… प्लीज़ आप नहाकर ड्रेस चेंज कर दीजिए। हम चलते हैं नीचे…” साक्षी ने उसे समझाने की कोशिश की।
“नहीं… मैं अभी नीचे जा रही हूँ। मैं तुम्हारे घरवालों को और धोखे में नहीं रख सकती।” तारा ने जवाब दिया और वहाँ से नीचे जाने लगी।
साक्षी और साहित्य उसको रोकने के लिए उसके पीछे जा रहे थे।
चलते हुए साहित्य ने कहा, “हमें ही कुछ करना होगा… ध्रुव भैया भी नीचे नहीं है।”
“जो भी सोचना है, जल्दी सोचो। याद है ना तारा भाभी ने क्या कहा था? घरवालों के सामने अपनी सच्चाई प्रूफ करने के बाद वो यहाँ से चली जाएगी।” साक्षी ने जवाब दिया।
उसकी बात सुनकर साहित्य वहीं पर रुक गया। उसे वहीं रुका हुआ देखकर साक्षी को गुस्सा आया। “पागल हो गए हो क्या? तारा भाभी हमारी बात नहीं सुन रही, ऊपर से तुम भी यहाँ मूर्ति बनकर खड़े हो गए। हमें उनकी हेल्प करनी होगी, वरना घरवाले उन्हें गलत समझेंगे।” साक्षी उसका हाथ पकड़कर उसे ले जाने लगी।
“नहीं, साक्षी, रुको…” साहित्य ने साक्षी को रोकते हुए कहा, “सच्चाई साबित होने पर तारा दीदी यहाँ से चली जाएगी।”
साहित्य की बात सुनकर साक्षी के भी क़दम वहीं रुक गए। उन दोनों ने नीचे की तरफ ध्यान करके देखा तो तारा नीचे हॉल में पहुँचने ही वाली थी, जहाँ घर के बाकी लोग मौजूद थे।
साक्षी समझ गई कि साहित्य क्या कहना चाह रहा था। उसने उसकी बात पर हामी भरते हुए पलकें झपकाईं।
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