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Chapter 15

The Replaced bride - Chapter 15

The Replaced bride

रत्ना जी ध्रुव और ग्रीष्मा को फेरों में पर्दा करने से जुड़ी रस्म करने के लिए मना रही थीं। ध्रुव ने उसे करने के लिए साफ मना कर दिया था। रत्ना जी उसकी बात मानने ही वाली थीं, तभी ग्रीष्मा ने उस रस्म करने के लिए अपनी हामी भर दी थी।

“ये कैसी बातें कर रही हो तुम, ग्रीष्मा? यहां तारा तक समझ गई है और तुम हो… आई नेवर एक्सपेक्टेड सच थिंग फ्रॉम यू…” ध्रुव ने नाराज होकर कहा।

“मैं जानती हूँ, ध्रुव, कि ये सब दकियानूसी बातें हैं, लेकिन कहीं ना कहीं मैं भी थोड़ी बहुत सुपरस्टिशस हूँ और इन सब नजर लगने वगैरह में बिलीव करती हूँ।” ग्रीष्मा ने अपनी बात रखी।

“लेकिन मैं ये सब नहीं करने वाला…” ध्रुव अभी तक अपनी जिद पर अड़ा था।

“अब तो ग्रीष्मा भी मान गई है। फिर तुम्हें क्या दिक्कत है?” रत्ना जी ने कहा।

“मुझे जो गलत लगेगा, उसे मैं गलत ही कहूँगा। ज़रूरी नहीं कि ग्रीष्मा और मेरी थिंकिंग की सब जगह पर मैच हो। आई रिस्पेक्ट योर वैल्यूज़, पर मैं ये नहीं करने वाला…” ध्रुव ने उस रिवाज को मानने से साफ इंकार कर दिया था।

तारा को भी ध्रुव की बात सही लग रही थी, इसलिए उसने बीच में बोलना सही नहीं समझा।

“क्या तुम मेरी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकते, ध्रुव?” ग्रीष्मा ने एक आखिरी कोशिश की।

“तुम्हारी खुशी के लिए मैं इतना कर सकता हूँ कि अगर तुम इस रस्म को फॉलो करना चाहती हो, तो मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। लेकिन मैं ये नहीं करने वाला।” ध्रुव ने प्यार से कहा और वहाँ से चला गया।

उसे समझाने की उन सब की कोशिशें बेकार हो चुकी थीं, लेकिन साथ ही ग्रीष्मा के रस्म करने को हां कहने की वजह से रत्ना जी खुश थीं।

“मैं माँ सा को बता कर आती हूँ कि तुमने इस रिवाज को करने के लिए हां कह दी है।” रत्ना जी ने मुस्कुरा कर कहा और वहाँ से चली गईं। उनके जाते ही तारा ने जल्दी से दरवाज़ा बंद किया और ग्रीष्मा के पास आई।

“आपके पास अच्छा मौका था इस रस्म को करने से मना करने के लिए… ध्रुव सर आपके साथ थे। फिर आपने हां क्यों कहा?” तारा ने हैरानी से पूछा।

“तुम नहीं समझोगी, तारा, एक लड़की की शादी सिर्फ़ लड़के से नहीं, उसके पूरे परिवार से होती है, जहाँ उसे सबके साथ बनाकर रखना होता है। मैं भी इन सब में नहीं मानती, लेकिन मम्मी जी की खुशी के लिए मैंने हां कर दिया।”

“लेकिन ये तो गलत है ना, ग्रीष्मा… जिस काम को करने के लिए आपका दिल ही नहीं माने, उसके लिए आपको ज़बरदस्ती हां नहीं करनी चाहिए थी।”

“कुछ काम अपनी खुशी के लिए नहीं, अपनों की खुशी के लिए किए जाते हैं। इन सब को छोड़ो, मैं ध्रुव से बात करके आती हूँ और उसे मनाने की कोशिश करती हूँ। मेरे हां कहने की वजह से वो भी मुझसे नाराज़ हो गया होगा।” ग्रीष्मा वहाँ से ध्रुव के पास चली गई।

तारा को ग्रीष्मा का बर्ताव बहुत ही अजीब लग रहा था, लेकिन उसने ज़्यादा कुछ कहना सही नहीं समझा।

रात के 11:00 बज रहे थे। ध्रुव उम्मेद भवन पैलेस के गार्डन में बैठा लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। उसके पास कॉफ़ी का मग पड़ा था, जिससे बीच-बीच में वो एक-दो सिप ले रहा था।

ग्रीष्मा उसे मनाने के लिए उसके पास आई। उसने ध्रुव के पास कुर्सी खिसका कर उस पर बैठ गई।

“गुस्सा हो?” ग्रीष्मा ने पूछा।

“तुम्हें क्या लगता है, मुझे गुस्सा होना चाहिए या नहीं?” उसके सवाल के बदले ध्रुव ने अपना सवाल रखा।

“मैं जानती हूँ, मुझे हां नहीं कहनी चाहिए थी, लेकिन मम्मी जी बहुत प्यार से हमें वो रस्म करने के लिए कह रही थीं।”

“कल को वो प्यार से तुम्हें मुझसे अलग होने के लिए कहेगी, तो क्या तुम उनकी बात मान जाओगी?”

ध्रुव की बात सुनकर ग्रीष्मा चुप हो गई और उसने अपनी नज़रें झुका लीं।

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“तुम्हारी चुप्पी में मुझे अपना जवाब मिल गया, ग्रीष्मा। ये अच्छी बात है कि तुमने उनकी खुशी के लिए हां कह दी, लेकिन आगे से ऐसे किसी काम के लिए हां मत करना, जिसे करने के लिए तुम्हारा दिल ही हां ना करे।” ध्रुव ने सख्त आवाज़ में कहा।

“ध्रुव, मैं चाहती हूँ कि तुम भी इस रस्म को करने के लिए हां कह दो।” ग्रीष्मा ने बिल्कुल धीमी आवाज़ में जवाब दिया।

“मतलब मेरे इतने लंबे-चौड़े भाषण का तुम पर कोई असर नहीं पड़ा। तुम लड़कियाँ इतनी जिद्दी क्यों होती हो? अब तक मैं तारा को बेवकूफ़ समझता था, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कर देती थी, लेकिन एट लिस्ट उस लड़की में इतनी समझ तो है कि वो गलत को गलत कहने की हिम्मत रखती है, चाहे सामने कोई भी क्यों ना हो।”

“लगता है तुम्हें तारा पसंद आने लगी है।” ग्रीष्मा ने हल्की मुस्कुराहट के साथ पूछा।

“मैं उसे पिछले 3 दिन से जानता हूँ, तुम अच्छे से जानती हो कि इन 3 दिनों में हम कितनी बार बहस कर चुके होंगे। उसके बावजूद तुम ये सवाल पूछ रही हो?”

“सवाल नहीं पूछ रही, बस जो फील हुआ वही बता रही थी। क्या हुआ जो उसका फ़र्स्ट इंप्रेशन अच्छा नहीं था, लेकिन लड़की तो अच्छी है ना…” ग्रीष्मा ने कहा।

“हाँ, लड़की अच्छी है।” बोलते हुए ध्रुव का ध्यान सामने खिड़की की तरफ़ गया। उसने देखा तारा वहाँ पर थी और उन दोनों की तरफ़ ही देख रही थी।

“अच्छा, तारा की बात छोड़ो, मैं चाहती हूँ कि तुम मम्मी जी की खुशी के लिए इस रस्म के लिए हां कह दो। प्लीज़ अब बहस मत करना। तुमने रिश्तेदारों को शादी में आने से मना कर दिया, इस वजह से वो पहले से ही नाराज़ हैं। अब उन्हें और नाराज़ मत करो। मेरे लिए ना सही, उनकी खुशी के लिए हां कह दो।” ग्रीष्मा ध्रुव को मनाने की हर संभव कोशिश कर रही थी।

उसकी बात सुनकर ध्रुव ने थोड़ी देर तक सोचा और फिर मुस्कुराते हुए जवाब में कहा, “लगता है अच्छी बहू होने पर माँ की तरफ़ से तुम्हें फ़ुल पॉइंट्स मिलने वाले हैं।”

“मतलब तुम मम्मी जी की बात मानने वाले हो?” ग्रीष्मा ने उत्साहित होकर पूछा।

ध्रुव ने उसकी बात पर हाँ में पलकें झपकाईं, तो खुश होकर ग्रीष्मा ने उसे गले लगा लिया।

“आववव… थैंक यू सो मच, बेबी… तुम नहीं जानते जब मैं मम्मी जी को ये बात बताऊँगी, तो वो कितना खुश होंगी।”

ध्रुव ने ग्रीष्मा को खुद से अलग किया और कहा, “अच्छा, ठीक है बाबा, चलो अब जाकर उन्हें बता दो, ताकि उन्हें भी खुशी मिल जाए।”

“मैं अभी आती हूँ।” ग्रीष्मा ने खुश होकर कहा और वहाँ से चली गई।

ध्रुव मुस्कुराते हुए वापस अपने काम लग गया। तारा उन दोनों को ऊपर से देख रही थी। जिस तरह से ग्रीष्मा ने खुश होकर ध्रुव को गले लगाया था, उससे वो समझ गई थी कि उसने ध्रुव को मना लिया था।

“आखिर ग्रीष्मा ने इस खड़ूस को मना ही लिया। इसी बहाने पहली बार इसे मुस्कुराते हुए देख रही हूँ। कितना अच्छा तो लगता है मुस्कुराते हुए, फिर पता नहीं क्यों टिंडे जैसी शक्ल बनाकर रखता है।”

“तारा दीदी, ध्रुव भैया को टिंडे बिल्कुल पसंद नहीं हैं।” उसके पास खड़े साहित्य ने कहा।

“फिर भी टिंडे की तरह मुँह फुला कर रखता है।”

“आपको अभी भी कोई झोल नहीं लगा ग्रीष्मा में?” साक्षी ने पूछा।

“हाँ, कई बार उनकी हरकतें मुझे अजीब ज़रूर लगती हैं, लेकिन फिर वो जिस हिसाब से चीज़ें समझाती है और अपना लॉजिक रखती है, तो उन पर विश्वास हो जाता है।” तारा ने जवाब दिया।

“लेकिन मुझे वो बहुत अजीब लगती हैं। आपको कुछ कहती हैं, भाई को कुछ कहती हैं और मम्मी को कुछ और…” साक्षी ने कहा।

“हाँ, इस बार मुझे भी अजीब लगा। वो विदेश में पढ़ी-लिखी है। पहली बार मैंने उन्हें देखा था, तब उन्होंने बहुत छोटे कपड़े पहन रखे थे और अब घूँघट वाली रस्म के लिए हाँ कहना, ये थोड़ा अजीब है। रत्ना आंटी के सामने उन्होंने कहा था कि वो भी थोड़ी-बहुत अंधविश्वासी है, इस वजह से ये रस्म करना चाहती है। मुझे कहती है कि वो ये रस्म मम्मी जी की खुशी के लिए करना चाहती है और अब पता नहीं ध्रुव सर को जाकर क्या बोलकर आई होंगी।” तारा हर एक बात को मिलाकर देख रही थी।

“तभी वो हमें अच्छी नहीं लगतीं। वो हर अलग इंसान से अलग-अलग तरह की बातें करती हैं।” साहित्य ने कहा।

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“आप भी अच्छी हो, आपका बिहेवियर रियल लगता है। पर लेकिन पता नहीं क्यों, वो हमें फ़ेक लगती है। वो मीठी-मीठी बातें करके हमें मैनिपुलेट करने की कोशिश करती है।” साक्षी ने अपनी बात रखी।

“लेकिन अब तो कुछ नहीं हो सकता ना… परसों उन दोनों की शादी होने वाली है और उसके अगले दिन मैं भी यहाँ से चली जाऊँगी। तुम लोग उन्हें एक्सेप्ट करने की कोशिश करो। क्या पता फिर वो तुम लोगों को समझ आने लगें।” तारा ने उन दोनों को समझाने की कोशिश की।

साक्षी और साहित्य दोनों ने ही उसकी बात पर ना में सिर हिलाया। वो चाहकर भी ग्रीष्मा पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे।

“मैं ज़्यादा कुछ तो नहीं कर पाऊँगी, लेकिन जाते वक़्त रत्ना आंटी से बात करके ज़रूर जाऊँगी कि वो तुम दोनों को अच्छी पढ़ाई के लिए बाहर भेज दें।”

“क्या सच में?” साहित्य ने पूछा।

“आपके इस फ़ेवर के लिए थैंक यू सो मच, दीदी, लेकिन आप मम्मा से नहीं, ध्रुव भैया से बात कीजिएगा। हमारे घर में उन्हीं की चलती है। अगर उन्होंने हाँ कह दी, तो बाकी लोगों को अपने आप हाँ कहने ही पड़ेंगे।” साक्षी बोली।

“हाँ, तारा दीदी, डब्बू सही कह रही है। अगर हम बाहर पढ़ने चले गए, तो इसी बहाने ग्रीष्मा का चेहरा भी नहीं देखना पड़ेगा।”

उनकी बात सुनकर तारा हँसी और उन दोनों के सर पर हल्की चपत लगाकर बोली, “पागल हो तुम दोनों… इतने कम एज में ये जासूस वाला दिमाग कहाँ से लेकर आए?”

“जहाँ से आप लेकर आईं। आप भी तो ज़्यादा बड़ी नहीं हुईं। उसके बावजूद आप कितनी अच्छी हो। सबकी बात अच्छे से समझती हो और बहुत बहादुर हो।” साक्षी ने कहा।

“मुझे अपना ये राजस्थान का घी लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं ऐसे ही तुम दोनों का काम कर दूँगी।”

तारा की बात सुनकर साहित्य और साक्षी हँसे। उसके बाद गुड नाईट बोलकर वो अपने-अपने कमरे में चले गए। उनके जाने के बाद तारा भी सोने जा चुकी थी।

अगला पूरा दिन ध्रुव और ग्रीष्मा की शादी की बाकी की रस्में निपटाने में गया, जहाँ हल्दी की रस्म के बाद संगीत की रस्म थी।

ग्रीष्मा को बहू के रूप में पाकर रत्ना जी बहुत खुश थीं। वहीँ उनका पूरा परिवार भी उसे पसंद करता था। तारा के समझाने पर साक्षी और साहित्य भी इस शादी में अच्छे से शरीक हो रहे थे।

संगीत की रस्म पूरी होने पर देर रात ध्रुव और ग्रीष्मा एक-दूसरे से पैलेस की छत पर मिले। उनकी ये डेट सबसे छुपकर तारा ने ही अरेंज की थी। तारा वहीं पर खड़ी आने-जाने वाले लोगों का ध्यान रख रही थी, ताकि कोई वहाँ पर ना आ जाए।

उसने उस जगह को उन दोनों के लिए बहुत अच्छे से डेकोरेट भी करवा दिया था।

“लगा नहीं था कि शादी से पहले मिल पाएँगे। तारा ने सच में इस बार अच्छा काम किया है।” ध्रुव ने पीछे से ग्रीष्मा को गले लगाकर कहा।

“हाँ, वो बहुत अच्छी है। देखो ना हमारे लिए कितनी अच्छी अरेंजमेंट्स की है।” ग्रीष्मा ने वहाँ की डेकोरेशन देखकर कहा, “ध्रुव, प्लीज़ तुम उसे शादी में आने की परमिशन दे दो ना… इतने कम वक़्त में वो हमारी फैमिली की तरह बन गई है।”

“नहीं, ग्रीष्मा, जानता हूँ तारा ट्रस्टवर्दी है, लेकिन मैंने उसे आने की इजाज़त दी, तो मामी और बाकी फैमिली का राग अलापना शुरू हो जाएगा। वो यही कहेंगे बाकी के रिश्तेदारों को बुलाया नहीं और एक अनजान लड़की को शादी में शामिल होने की इजाज़त दे दी।”

“ठीक है।” ग्रीष्मा ने मायूस होकर कहा।

“तुम्हारे मुँह पर ये उदासी अच्छी नहीं लगती। चलो अब एक प्यारी सी स्माइल दो… कल के बाद हम दोनों के बीच सारी दूरियाँ मिट जाएँगी और हम एक हो जाएँगे।” बोलते हुए ध्रुव के होंठ ग्रीष्मा के गाल के बिल्कुल पास थे।

ध्रुव ने हल्के से ग्रीष्मा के गाल पर किस किया। ग्रीष्मा ने शर्मा कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

उन दोनों को एक साथ इतने करीब देखकर तारा ने अपना मुँह फेर लिया। “दोनों साथ में कितने अच्छे लग रहे हैं। भगवान जी इनके साथ यूँ ही बनाए रखिएगा।” उसने आसमान की तरफ़ देखकर कहा। पहली बार आसमान की तरफ़ देखकर वो शिकायतें करने के बजाय किसी और के लिए दुआ माँग रही थी।

★★★★

हे रीडर्स...!

शादी का पल नज़दीक आ रहा है। देखते हैं यहाँ कौन सा नया धमाका होता है। जानने के लिए बने रहिए। और समीक्षा भी कीजिएगा।

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